UP Board Class 12 Gyansindhu General Hindi Question Bank 2026 [Page -17]

UP Board Class 12 Question Bank 2026 : Gyansindhu Pariksha Prahar General Hindi सामान्य हिंदी की क्वेश्चन बैंक 2026 (Full Book – PAGE-17

राष्ट्र का स्वरुप  डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल (Part-2)

(4)   मातृभूमि पर निवास करनेवाले मनुष्य राष्ट्र का दूसरा अंग हैं। पृथिवी हो और मनुष्य न हों तो राष्ट्र की कल्पना असम्भव है। पृथिवी और जन दोनों के सम्मिलन से ही राष्ट्र का स्वरूप सम्पादित होता है। जन के कारण ही पृथिवी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है। पृथिवी माता है और जन सच्चे अर्थो में पृथिवी का पुत्र है।

  गद्यांश का भाव- इस गद्यांश में राष्ट्र के दूसरे महत्त्वपूर्ण तत्त्व ‘जन’ के सन्दर्भ में लेखक ने अपने विचार व्यक्त किए हैं।

  1. राष्ट्र की कल्पना कब असम्भव है?

               उत्तर- मनुष्य के बिना राष्ट्र की कल्पना असम्भव है ।

  1. पृथिवी और जन दोनों मिलकर क्या बनाते हैं?

               उत्तर- पृथिवी और जन दोनों मिलकर राष्ट्र का स्वरूप बनाते हैं।

  1. पृथिवी कब मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है?

               उत्तर- जन के कारण ही पृथ्वी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है।

  1. रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

               उत्तर- रेखांकित अंश की व्याख्या- राष्ट्र के स्वरूप का निर्माण; पृथ्वी और जन दोनों की विद्यमानता की स्थिति में ही सम्भव है। पृथ्वी पर ‘जन’ का निवास होता है, तभी पृथ्वी मातृभूमि कहलाती है। जब तक किसी भू-भाग में निवास करनेवाले मनुष्य वहाँ की भूमि को अपनी सच्ची माता और स्वयं को उस भूमि का पुत्र नहीं मानते, तब तक राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न नहीं हो सकती ।

  1. पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए ।

उत्तर- पाठ का शीर्षक- राष्ट्र का स्वरूप। लेखक- डॉ0 वासुदेवशरण अग्रवाल।

  1. जन सच्चे अर्थो में पृथिवी का क्या है?

               उत्तर- पृथिवी माता है और जन सच्चे अर्थो में पृथिवी का पुत्र है।

 

(5)    माता पृथिवी को प्रणाम है। माता पृथिवी को प्रणाम है। यह प्रणाम-भाव ही भूमि और जन का दृढ़ बन्धन है। इसी दृढ भित्ति पर राष्ट्र का भवन तैयार किया जाता है। इसी दृढ़ चट्टान पर राष्ट्र का चिरजीवन आश्रित रहता है। इसी मर्यादा को मानकर राष्ट्र के प्रति मनुष्यों के कर्त्तव्य और अधिकारों का उदय होता है। जो जन पृथिवी के साथ माता और पुत्र के सम्बन्ध को स्वीकार करता है, उसे ही पृथिवी के वरदानों में भाग पाने का अधिकार है। माता के प्रति अनुराग और सेवाभाव पुत्र का स्वाभाविक कर्त्तव्य है। वह एक निष्कारण धर्म है। स्वार्थ के लिए पुत्र का माता के प्रति प्रेम, पुत्र के अधःपतन को सूचित करता है। जो जन मातृभूमि के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ना चाहता है, उसे अपने कर्तव्यों के प्रति पहले ध्यान देना चाहिए ।

गद्यांश का भाव- लेखक ने यहाँ स्पष्ट किया है कि तभी एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण सम्भव हो पाता है, जब उसका प्रत्येक व्यक्ति अपने देश की पृथ्वी और उसकी प्रत्येक वस्तु को जन्मदात्री माता के समान आदर प्रदान करे।

  1. गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।

उत्तर-        उपर्युक्त

  1. रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

उत्तर-        रेखांकित अंश की व्याख्या- वासुदेवशरण जी कहते हैं कि अपनी धरती के प्रति आदर-भाव; व्यक्ति और धरती के सम्बन्ध को दृढ़ करता है तथा पृथ्वी और मनुष्य का दृढ़ सम्बन्ध राष्ट्र को पुष्ट और विकसित करता है। इस प्रकार आदर-भाव की इस सुदृढ़ दीवार पर ही राष्ट्र के भवन को निर्मित किया जा सकता है। आदर की यह भावना एक दृढ़ चट्टान के समान है। इसी चट्टान पर टिककर राष्ट्र का जीवन चिरस्थायी हो जाता है। ‘‘पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका आज्ञाकारी पुत्र हूँ।“ इस भावना के साथ तथा माता और पुत्र के सम्बन्ध की मर्यादा को स्वीकार करके प्रत्येक देशवासी अपने राष्ट्र एवं देश के लिए अपने कर्त्तव्यों और अधिकारों के प्रति सजग हो सकता है।

  1. ‘‘यह प्रणाम-भाव ही भूमि और जन का दृढ़ बन्धन है। इसी दृढ़भित्ति पर राष्ट्र का भवन तैयार किया जाता है।“ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-        उपर्युक्त पंक्ति का आशय यह है कि अपनी धरती के प्रति आदर-भाव व्यक्ति और धरती के सम्बन्ध को दृढ़ करता है और पृथ्वी तथा मनुष्य का दृढ़ सम्बन्ध राष्ट्र को पुष्ट और विकसित करता है। इस प्रकार आदर-भाव की इस सुदृढ़ दीवार पर ही राष्ट्र का भवन निर्मित किया जा सकता है।

  1. पृथ्वी के वरदानों में कुछ पाने का अधिकार किसे होता है?

उत्तर-        पृथ्वी के वरदानों अथवा पृथ्वी में छिपी अपार सम्पदा में कुछ पाने का अधिकार केवल उन्हें ही होता है, जो पुत्र धरतीरूपी माता का सत्कार करते हैं।

  1. धरती माता के प्रत्येक सच्चे पुत्र का क्या कर्त्तव्य है?

उत्तर-        धरती माता के प्रत्येक सच्चे पुत्र का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी धरती माता से स्नेह करे, निःस्वार्थ भाव से उसकी सेवा करे और इस प्रकार उसका आशीर्वाद प्राप्त करे।

  1. यह प्रणाम भाव ही भूमि और जन का दृढ़बन्धन है’। इस पंक्ति से लेखक का क्या आशय है?

उत्तर-        प्रस्तुत पंक्ति से यह आशय है कि अपनी मातृभूमि के प्रति आदर व सम्मान का भाव ही व्यक्ति और भूमि को प्रगाढ़ और दृढ़ बनाता है। यही दृढ़ता राष्ट्र या देश के विकास में सहायक होती है।

  1. पृथ्वी के रत्नों को कौन प्राप्त कर सकता है?

उत्तर-        पृथ्वी के रत्नों को वही प्राप्त कर सकता है जो यह नता हो कि ‘‘पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका आज्ञाकारी पुत्र हूँ“।

  1. कैसे व्यक्ति राष्ट्र का उत्थान नहीं कर सकते?

उत्तर-        स्वार्थी व्यक्ति कभी राष्ट्र का उत्थान नहीं कर सकते।

  1. निम्न शब्दों के शब्दार्थ लिखिए- दृढ़भित्ति, चिरजीवन, निष्करण धर्म, अधःपतन।

शब्दों के शब्दार्थ निम्न प्रकार हैं-

दृढ़भित्ति- मजबूत दीवार

चिरजीवन– सम्पूर्ण जीवन

निष्कारण धर्म – ऐसा धर्म जिसमें स्वार्थ की-भावना नहीं रहती

अधःपतन- नीचे गिरना

  1. प्रस्तुत गद्यांष में लेखक का क्या उद्देश्य है?

उत्तर-        लेखक का उद्देश्य है कि किसी शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण तभी सम्भव है, जब प्रत्येक व्यक्ति देश की भूमि और प्रत्येक वस्तु को माता के  समान आदर करे।

 

(6)           माता अपने सब पुत्रों को समान भाव से चाहती है। इसी प्रकार पृथिवी पर बसने वाले जन बराबर हैं। उनमें ऊँच और नीच का भाव नहीं है। जो मातृभूमि के उदय के साथ जुड़ा हुआ है, वह समान अधिकार का भागी है। पृथिवी पर निवास करनेवाले जनों का विस्तार अनन्त है-नगर और जनपद, पुर और गाँव, जंगल और पर्वत नाना प्रकार के जनों से भरे हुए हैं। ये जन अनेक प्रकार की भाषाएँ बोलनेवाले हैं और अनेक धर्मों के माननेवाले हैं, फिर भी ये मातृभूमि के पुत्र हैं और इस इस प्रकार उनका सौहार्द भाव अखण्ड है। सभ्यता और रहन-सहन की दृष्टि से जन एक- दूसरे से आगे-पीछे हो सकते हैं किन्तु इस कारण से मातृभूमि के साथ उनका जो सम्बन्ध है उसमें कोई भेदभाव उत्पन्न नहीं हो सकता। पृथिवी के विशाल प्रांगण में सब जातियों के लिए समान क्षेत्र है। समन्वय के मार्ग से भरपूर प्रगति और उन्नति करने का सबको एक जैसा अधिकार है। किसी जन को पीछे छोड़कर राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता। अतएव राष्ट्र के प्रत्येक अंग की सुध हमें लेनी होगी।

गद्यांश का भाव- यहाँ लेखक ने राष्ट्र के विभिन्न महत्त्वपूर्ण अंगों का विवेचन किया है तथा यह स्पष्ट किया है कि हमें समानता का व्यवहार करते हुए अपनी धरती माता की निःस्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए।

  1. पुत्रों को समान भाव से कौन रखती है?

उत्तर-        माता पुत्रों को समान भाव से रखती है ।

  1. समान अधिकार का भागी कौन है?

उत्तर- जो मातृभूमि के उदय के साथ जुड़ा हुआ है, वह समान अधिकार का भागी है।

  1. पृथ्वी पर किसका विस्तार अनन्त है?

उत्तर-        पृथ्वी पर निवास करनेवाले जनों का विस्तार अनन्त है।

  1. अनन्त’ और ‘जनपद’ शब्द का अर्थ लिखिए ।

उत्तर-        ‘अनन्त’ का अर्थ है जिसका अन्त न हो और ‘जनपद’ का अर्थ जिला है।

  1. पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए ।

उत्तर-        पाठ का शीर्षक- राष्ट्र का स्वरूप । लेखक – डॉ0 वासुदेवशरण अग्रवाल।

  1. माता अपने सब पुत्रों को किस भाव से चाहती है ?

उत्तर- माता अपने सब पुत्रों को समान भाव से चाहती है ।

  1. राष्ट्र के प्रत्येक अंग की सुध हमें क्यों लेनी होगी ?

उत्तर- किसी एक अंग को पीछे छोड़कर राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता , इसलिए राष्ट्र के प्रत्येक अंग की सुध हमें लेनी चाहिए।

  1. सौहार्द’ और ‘प्रांगण’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- ‘सौहार्द’ का अर्थ भाईचारा, मैत्री का भाव है तथा ‘प्रांगण’ का अर्थ सामने का खुला बड़ा भाग (आँगन) है।

  1. रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।

रेखांकित अंश की व्याख्या- जिस प्रकार से भाइयों में ऊँच-नीच का भाव नहीं होता, उसी प्रकार इस पृथ्वी पर रहनेवाले सभी मनुष्य भी समान भाव से रहते हैं। उनमें ऊँच-नीच का कोई भाव नहीं होता है। इस धरती पर जिसका भी जन्म हुआ है, वह समान सुविधाओं का अधिकारी है। यह धरती माता अपने सभी पुत्रों को समान रूप से ही समस्त सुविधाएँ प्रदान करती है। मातृभूमि की सीमाएँ अनन्त हैं। इसके निवासी अनेक नगरों, जनपदों, शहरों, गाँवों, जंगलों और पर्वतों में भरे हुए हैं।

  1. कोई भी राष्ट्र किसे पीछे छोड़कर आगे नहीं बढ़ सकता है?

उत्तर-        कोई भी राष्ट्र किसी जन को पीछे छोड़कर राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता।

  1. समन्वय के मार्ग से क्या प्राप्त हो सकता है?

उत्तर-        समन्वय के मार्ग से समाज के सभी वर्गों की उन्नति एवं प्रगति का लक्ष्य प्राप्त हो सकता है।

  1. सौहार्द’ और ‘अखण्ड’ शब्द का अर्थ लिखिए।

उत्तर-        ‘सौहार्द’ शब्द का अर्थ- मित्रता, ‘अखण्ड’ शब्द का अर्थ- सम्पूर्ण।  

  1. ‘‘प्रगति और उन्नति करने का सबको एक जैसा अधिकार है।“-पंक्ति का क्या आशय है?

उत्तर-        प्रस्तुत पंक्ति का आशय यह है कि व्यक्ति अमीर हो या गरीब सभी में मातृभूमि के लिए समान प्रेम-भाव होता है। संसार के समस्त  प्राणियों को प्रगति व उन्नति करने के लिए मातृभूमि समान अवसर प्रदान करती है।

  1. गद्यांश में मातृभूमि की सीमाओं को अनन्त क्यों कहा गया है?

उत्तर-        गद्यांश में मातृभूमि की सीमाओं को अनन्त इसलिए कहा गया है, क्योंकि इसके निवासी अनेक नगरों, शहरों, जनपदों, गाँवों, जंगलों एवं पर्वतों में बसे हुए हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों पर रहने वाले, अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले, विभिन्न धर्मों को मानने वाले हैं, परन्तु वे सभी एक ही धरती माता के पुत्र हैं।

  1. प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से क्या सन्देश मिलता है?

उत्तर-        इस गद्यांश के माध्यम से लेखक ने राष्ट्र के विभिन्न महत्त्वपूर्ण अंगों का विवेचन करते हुए हमें सन्देश दिया है कि समानता का व्यवहार करते हुए हमें अपनी धरती माता की निःस्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए।

UP Board Class 12 Question Bank 2026 : Gyansindhu Pariksha Prahar General Hindi सामान्य हिंदी की क्वेश्चन बैंक 2026 

पिछले पेज पर जायें  ||  अगले पेज पर जायें

error: Content is protected !!