UP Board Class 12 Question Bank 2026 : Gyansindhu Pariksha Prahar General Hindi सामान्य हिंदी की क्वेश्चन बैंक 2026 (Full Book – PAGE-19)
राष्ट्र का स्वरुप – डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल (Part-4)
(10) साहित्य, कला, नृत्य, गीत, आमोद-प्रमोद अनेक रूपों में राष्ट्रीय जन अपने-अपने मानसिक भावों को प्रकट करते हैं। आत्मा का जो विष्वव्यापी आनन्द-भाव है वह इन विविध रूपों में साकार होता है। यद्यपि बाह्य रूप की दृष्टि से संस्कृति के ये बाहरी लक्षण अनेक दिखाई पड़ते हैं, किन्तु आन्तरिक आनन्द की दृष्टि से उनमें एकसूत्रता है। जो व्यक्ति सहृदय है, वह प्रत्येक संस्कृति के आनन्द-पक्ष को स्वीकार करता है और उससे आनन्दित होता है। इस प्रकार की उदार भावना ही विविध जनों से बने हुए राष्ट्र के लिए स्वास्थ्यकर है।
गद्यांश का भाव- लेखक ने यहाँ स्पष्ट किया है कि संस्कृति जीवन को आनन्द प्रदान करती है। उस आनन्द को मानव विविध रूपों में, प्रकट करता है।
- उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम
अथवा उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए ।
उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश सुविदित साहित्यकार डॉ0 वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखित ‘राष्ट्र का स्वरूप’ नामक निबन्ध से उद्धृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।
- रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर- रेखांकित अंश की व्याख्या- बाह्य दृष्टि से देखने पर ये सभी भिन्न-भिन्न दिखाई देती हैं, किन्तु इनके अन्दर मूल रूप से एक ही सूत्र, एक ही आत्मा होती है। सहृदयता से प्रत्येक संस्कृति के आनन्द देनेवाले पक्ष को स्वीकार करना ही राष्ट्रीयता की भावना का परिचायक है। इस प्रकार वे सभी संस्कृतियाँ एकसूत्र में बँधती हैं और वे ही सम्पूर्ण राष्ट्र की सम्मिलित संस्कृति को मुखरित करती हैं। किसी राष्ट्र के सबल अस्तित्व के लिए इस प्रकार की एकसूत्रता आवश्यक है।
- राष्ट्रीय जन किन रूपों में अपने मानसिक भावों अथवा मनोभावों को किन रूपों में प्रकट करते हैं?
उत्तर- राष्ट्रीय जन साहित्य, कला, नृत्य, गीत, आमोद-प्रमोद आदि के माध्यम से अपने मानसिक भावों को प्रकट करते हैं।
- आत्मा का विष्वव्यापी आनन्द-भाव किन रूपों में साकार होता है?
उत्तर- आत्मा का विश्वव्यापी आनन्द-भाव संस्कृति के विभिन्न माध्यमों; जैसे- साहित्य, कला, नृत्य, गीत, आमोद-प्रमोद आदि रूपों में ही साकार होता है।
- संस्कृति के आनन्द पक्ष को स्वीकारते हुए कौन आनन्दित होता है?
अथवा प्रत्येक संस्कृति के आनन्द पक्ष को कौन स्वीकार करता है? लिखिए।
उत्तर- प्रत्येक संस्कृति के अांनन्ददायी पक्ष को स्वीकारते हुए वही व्यक्ति आनन्दित होता है, जो सहृदय है; अर्थात् जो अच्छे, उदार और व्यापक हृदयवाले हैं।
- ‘विष्वव्यापी’ और ‘आन्तरिक आनन्द’ का क्या अर्थ है?
उत्तर- ‘विष्वव्यापी’ का अर्थ – संसार में फैला (समाया) हुआ और ‘आन्तरिक आनन्द’ का अर्थ – आत्मिक आनन्द है।
- राष्ट्रीय व आनंदित शब्दों में प्रयुक्त प्रत्यय लिखिए।
उत्तर- राष्ट्रीय में – ‘ईय’ प्रत्यय है व आनंदित में ‘इत’ प्रत्यय है।
(11) पूर्वजों ने चरित्र और धर्म-विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में जो कुछ भी पराक्रम किया है, उस सारे विस्तार को हम गौरव के साथ धारण करते हैं और उसके तेज को अपने भावी जीवन में साक्षात् देखना चाहते हैं। यही राष्ट्र-संवर्धन का स्वाभाविक प्रकार है। जहाँ अतीत वर्तमान के लिए भार रूप नहीं है, जहाँ भूत वर्तमान को जकड़ नहीं रखना चाहता, वरन् अपने वरदान से पुष्ट करके उसे आगे बढ़ाना चाहता है, उस राष्ट्र का हम स्वागत करते हैं।
गद्यांश का भाव- लेखक ने राष्ट्र के सांस्कृतिक परिवंश पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि हम प्राचीन इतिहास से जुड़कर ही भावी उन्नति की दिशा में प्रयास करे।
- गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर- उपर्युक्त।
- रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर- सांस्कृतिक परिवेश विकास की एक पद्धति है। हमारे पूर्वजों ने चरित्र, धर्म, विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में जो उन्नति की है, उस पर गर्व करते हुए हम उसे राष्ट्र की विभूति के रूप में स्वीकार करते हैं। प्राचीनता के प्रति गौरव की भावना से हमारे मन में भावी प्रगति हेतु प्रबल आकांक्षा का उदय होता है। इस आकांक्षा को हम अपने भावी जीवन में साकार होता हुआ देखना चाहते हैं। हमारी कामना होती है कि इस गौरव को हम अपने जीवन में उतारें और अपने भविष्य को पुष्ट बनाएँ। यही राष्ट्र के विकास का स्वाभाविक ढंग है।
- हम गौरव के साथ किसे धारण करते हैं?
उत्तर- हमारे पूर्वजों ने अपने महान् चरित्र का उदाहरण प्रस्तुत करके धर्म, विज्ञान, साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में जो भी उल्लेखनीय कार्य किए हैं, उन्हें हम समग्र रूप में गौरव के साथ धारण करते है।
- हमारे पूर्वजों ने संस्कृति के किन क्षेत्रों में अपना पराक्रम दिखाया है?
उत्तर- हमारे पूर्वजों ने संस्कृति के धर्म, कला, साहित्य, विज्ञान आदि क्षेत्रों में तथा अपने चरित्र को महान् बनाने की दृष्टि से अपना पराक्रम दिखाया है।
- हम अपने भावी जीवन में किसे साकार होता हुआ देखना चाहते हैं?
उत्तर- प्राचीनता के प्रति गौरव की भावना से हमारे मन में भावी प्रगति हेतु प्रबल आकांक्षा का उदय होता है। इस आकांक्षा को ही हम अपने भावी जीवन में साकार होता हुआ देखना चाहते हैं।
- राष्ट्र के विकास का स्वाभाविक ढंग किसे बताया गया है?
उत्तर- हमारे पूर्वजों द्वारा दर्शाए गए महान् चरित्र और संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में उनके द्वारा किए गए महान कार्यों के परिणामस्वरूप हमारे मन में उनके प्रति गौरव का भाव उत्पन्न होता है। साथ ही हमारे मन में यह कामना भी उत्पन्न होती है कि हम गौरव को अपने जीवन में उतारें और अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाएँ। यही राष्ट्र के विकास का स्वाभाविक ढंग है।
- ‘राष्ट्र-संवर्धन’ का प्रकार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- पूर्वजों द्वारा प्रस्तुत किए गए उच्चादर्शों के परम् तेज का हम स्वयं साक्षात् अनुभव कर सकें और भावी पीढ़ी को भी वैसा आचरण करने के लिए प्रेरित कर सकें। यही राष्ट्र-संवर्धन का प्रकार है।
- ‘अतीत वर्तमान के लिए भार रूप नहीं है’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- इसका आशय यह है कि अतीत को वर्तमान का बोझ नहीं समझना चाहिए बल्कि उसे राष्ट्र अभिनन्दन के रूप में देखना चाहिए।
- लेखक किस राष्ट्र का स्वागत करना चाहता है?
उत्तर- लेखक ऐसे राष्ट्र का स्वागत करना चाहता है। जहाँ अतीत वर्तमान के लिए भारस्वरूप नहीं है, जहाँ भूत का नकारात्मक प्रभाव वर्तमान पर नहीं होता। ऐसा राष्ट्र अभिनन्दन करने योग्य है।
(12) विज्ञान और उद्यम दोनों को मिलाकर राष्ट्र के भौतिक स्वरूप का एक नया ठाट खड़ा करना है। यह कार्य प्रसन्नता, उत्साह और अथक परिश्रम द्वारा नित्य आगे बढ़ना चाहिए। हमारा यह ध्येय है कि राष्ट्र में जितने हाथ हैं उनमें से कोई भी इस कार्य में भाग लिये बिना रीता न रहे। तभी मातृभूमि की पुष्कल समृद्धि और समग्र रूपमंडन प्राप्त किया जा सकता है।
- प्रस्तुत गद्यांश के पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर- उपर्युक्त।
- रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर- लेखक के मतानुसार विज्ञान और परिश्रम दोनों को एकसाथ मिलाकर काम करना चाहिए, तभी राष्ट्र का भौतिक स्वरूप उन्नत बन सकता है। पर यह कार्य बिना किसी दबाव के किया जाना चाहिए। यह कार्य सबकी इच्छा, सहमति और प्रसन्नता से होना चाहिए तभी राष्ट्र उन्नति कर सकता है। उत्साह और परिश्रम भी इसके लिए आवश्यक हैं।
- ‘ध्येय’ और ‘पुष्कल’ शब्दों के अर्थ बताइए ।
उत्तर- ‘ध्येय’ का अर्थ- लक्ष्य और ‘पुष्कल’ का अर्थ- परिपूर्ण या पर्याप्त।
- मातृभूमि की समृद्धि किस प्रकार सम्भव है?
उत्तर- राष्ट्र में जितने हाथ हैं उनमें से कोई भी इस कार्य में भाग लिये बिना रीता न रहे। तभी मातृभूमि की पुष्कल समृद्धि और समग्र रूपमंडन सम्भव है।
- लेखक का क्या ध्येय है?
उत्तर- लेखक का ध्येय है कि राष्ट्र में जितने हाथ हैं उनमें से कोई भी इस कार्य में भाग लिये बिना होता न रहे।
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