UP Board Class 12 Question Bank 2026 : Gyansindhu Pariksha Prahar General Hindi सामान्य हिंदी की क्वेश्चन बैंक 2026 (Full Book – PAGE- 21)
अशोक के फूल -हजारीप्रसाद द्विवेदी (Part-2)
(3) कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है। शायद अशोक से उसका स्वार्थ नहीं सधा। क्यों उसे वह याद रखती? सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
- प्रस्तुत गद्यांश के लेखक व पाठ का नाम स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश के लेखक हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हैं तथा पाठ का नाम ‘अशोक के फूल’ है ।
- रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- व्याख्या- आ0 द्विवेदी जी कहते हैं कि यह संसार बड़ा ही स्वार्थी है। यह केवल उन्हीं बातों को याद रखता है, जिससे उसके स्वार्थ की सिद्धि होती है। जिन लोगों या वस्तुओं से उसका स्वार्थ नहीं सधता है, वह उन्हें शीघ्र ही भुला देता है। वह व्यर्थ में लोगों या वस्तुओं को याद करके बोझिल नहीं होता। समय की गति के साथ जो प्रासंगिक नहीं रह जाता, वह उन्हें भूलता जाता है ।
- प्रस्तुत गद्यांश में किस प्रसंग की चर्चा की गई है?
उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश में आचार्य द्विवेदी जी ने रचनाकारों अर्थात् साहित्यकारों द्वारा अशोक के फूल को भूल जाने की आलोचना की है ।
- लेखक ने गद्यांश में किस प्रकार के लोगों को स्वार्थी कहा है?
उत्तर- लेखक ने गद्यांश में उन रचनाकारों या साहित्यकारों को स्वार्थी कहा है जिन्होंने साहित्यकारों द्वारा ‘अशोक के फूल’ के भूल जाने की गलती की है। लेखक के अनुसार यह संसार बड़ा स्वार्थी है। यह केवल उन्हीं बातों को याद रखता है जिससे उसके स्वार्थ की सिद्धि होती है।
- ”सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।’’ पंक्ति का क्या आशय है?
उत्तर- लेखक कहना चाहता है कि यह संसार स्वार्थी व्यक्तियों से भरा पड़ा है। यहाँ हर व्यक्ति अपने ही स्वार्थ को साधने में लगा हुआ है। उसे अपने ही स्वार्थ को सिद्ध करने से फुरसत नहीं है, तो वह अशोक के फूल की क्या परवाह करेगा, जो शायद उसके लिए किसी काम का नहीं है ।
- गद्यांश की भाषा शैली लिखिए।
उत्तर- भाषा सरल, सहज, बोधगम्य एवं साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है। शैली व्याख्यात्मक एवं सूत्रात्मक है।
- अशोक को विस्मृत करने का आधार किसे माना गया है?
उत्तर- अशोक को विस्मृत करने का आधार स्वार्थवृत्ति को माना गया है।
- लेखक ने दुनिया का किस तरह का व्यवहार बताया है?
उत्तर- लेखक ने दुनिया के व्यवहार को इस तरह बताया है कि यह केवल उतना ही याद रखती है जितने से इसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंककर आगे बढ़ जाती है।
- स्वार्थ का अखाड़ा किसे कहा गया है?
उत्तर- सारे संसार को स्वार्थ का अखाड़ा कहा गया है।
(4) मुझे मानव-जाति की दुर्दम-निर्मम धारा के हजारों वर्ष का रूप साफ दिखाई दे रहा है। मनुष्य की जीवनी-शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। न जाने कितने धर्माचारों, विष्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती सी जीवन-धारा आगे बढ़ी है। संघर्षों से मनुष्य ने नई शक्ति पाई है। हमारे सामने समाज का आज जो रूप है, वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बाद की बात है।
सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है। शुद्ध केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा (जीने की इच्छा) है। वह गंगा की अबाधित- अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है । सभ्यता और संस्कृति का मोह क्षण-भर बाधा उपस्थित करता है, धर्माचार का संस्कार थोड़ी देर तक इस धारा से टक्कर लेता है, पर इस दुर्दम धारा में सब कुछ बह जाता है।
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
- प्रस्तुत गद्यांश के लेखक व पाठ का नाम स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश के लेखक हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हैं तथा पाठ का नाम ‘अशोक के फूल’ है।
- रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- छल-छद्म से परिपूर्ण वर्तमान जीवन में व्यक्ति के आचरण और सभ्यता से लेकर दैनिक उपभोग तक की प्रत्येक वस्तु में किसी-न-किसी प्रकार की मिलावट अवश्य है। संसार में आज यदि कुछ अपने शुद्ध रूप में विद्यमान है तो वह है मनुष्य की प्रत्येक विषम परिस्थिति में भी जीवित रहने की इच्छा। वह इच्छा आज भी उतनी ही बलवती और आडम्बरहीन है, जितनी कि अपने आदिकाल में थी। यह इच्छा आज भी उसी प्रकार उतनी ही पवित्र है, जिस प्रकार गंगा की धारा अनादिकाल से अपने मार्ग की बाधाओं को समाप्त करके अपने पहले जैसे प्रवाह के साथ निरन्तर गतिशील है और पहले जितनी ही पवित्र है। सभ्यता और संस्कृति का मोह एवं धर्माचार संस्कार कुछ समय के लिए ही इससे टक्कर लेता है, किन्तु मनुष्य की इस दुर्दम जिजीविषा में सब कुछ बह जाता है।
- मानव जाति किस मोह को रौंदती चली आ रही है?
उत्तर- मनुष्य की जीवनी-शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। अब तक न जाने उसने कितनी जातियों एवं संस्कृतियों को अपने पीछे छोड़ दिया है।
- मानव का व्यवहार किस प्रकार परिवर्तित होता है?
उत्तर- मानव कभी भी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट नहीं रहता। अतः हमेशा ही उसके व्यवहार एवं संस्कृति में परिवर्तन होता रहता है। इसके लिए वह हमेशा प्रयत्नशील रहा है।
- ‘‘मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है।’’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- ‘मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है।’ पंक्ति का आशय यह है कि व्यक्ति का अपने प्राणों से बहुत मोह होता है। वह सदैव अपने प्राणों की रक्षा के लिए प्रयास करता रहता है। यदि अपने प्राणों के लिए उसे किसी की हत्या भी करनी पड़े तो वह पीछे नहीं हटता, इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है तब उसे उचित-अनुचित का ध्यान भी नहीं रहता।
- मनुष्य की जीवन शक्ति कैसी है?
उत्तर- मनुष्य की जीवन शक्ति बड़ी निर्मम है, क्योंकि व्यक्ति का अपने प्राणों से मोह होता है। वह सदैव अपने प्राणों की रक्षा के लिए प्रयास करता रहता है। अपने प्राणों की रक्षा के लिए वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है, यहाँ तक कि वह कितना भी घृणित, निर्मम और क्रूर कार्य भी कर सकता है।
- हमारे सामने आज समाज का स्वरूप कैसा है?
उत्तर- हमारे सामने समाज का जो रूप है, वह अनेक ग्रहण व त्याग का रूप है अर्थात् हमें अनेक संघर्षों से प्राप्त हुआ है। आपसी सामंजस्य वस्तुतः अनके परम्पराओं एवं मूल्यों के बीच समन्वय एवं सन्तुलन का परिणाम है। यह सामंजस्य कई संस्कृतियों की अनेक परम्पराओं एवं उनके मूल्यों को ग्रहण करके तथा अपनी परम्पराओं एवं मूल्यों को त्यागकर स्थापित हुआ है।
- लेखक ने मनुष्य की जिजीविषा को किस रूप में प्रस्तुत किया है ?
उत्तर- लेखक ने मनुष्य की जिजीविषा को विशुद्ध रूप में प्रस्तुत किया है। लेखक का मानना है कि दुनिया की सारी चीजें मिलावट से पूर्ण हैं। कोई भी वस्तु अपने विशुद्ध रूप में उपलब्ध नहीं है। इसके पश्चात् केवल एक ही चीज विशुद्ध है और वह है मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा।
- हमारे सामने आज समाज का स्वरूप कैसा है?
उत्तर- हमारे सामने आज के समाज का स्वरूप विभिन्न सभ्यता एवं संस्कृतियों के ग्रहण और त्याग का रूप है।
- मनुष्य ने नई शक्ति किससे पाई है?
उत्तर- मनुष्य ने संघर्ष से नवीन शक्ति को प्राप्त किया है।
- ‘धर्माचारों’ और ‘विष्वासों’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- ‘धर्माचारों’ का अर्थ है- धार्मिक परम्परा तथा ‘विष्वासों’ का अर्थ है- निश्चित धारणा ।
- लेखक ने किसे बाद की बात बताया है ?
उत्तर- देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति को बाद की बात बताया है।
- ग्रहण और त्याग का रूप क्या है?
उत्तर- वर्तमान समाज का रूप न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है।
- गद्यांश में प्रयुक्त भाषा और शैली लिखिए।
उत्तर- भाषा सरल, सहज एवं साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। शैली व्याख्यात्मक एवं सूत्रात्मक है।
- अनाहत, जिजीविषा, अविशुद्ध, दुर्दम, निर्मम, विशुद्ध आदि शब्दों के अर्थ लिखिए।
उत्तर- अनाहत- जिस पर आघात न हुआ हो। जिजीविषा- जीने की इच्छा, अविशुद्ध- जो बिलकुल शुद्ध हो, दुर्दम- प्रबल, प्रचंड, निर्मम- ममतारहित, निष्ठुर, विशुद्ध- शुद्ध, खरा।
- मनुष्य की जीवनी शक्ति किन-किन को समाप्त करती हुई आज इस स्थिति में पहुंची है?
उत्तर- मनुष्य की जीवनी शक्ति हजारों वर्ष पूर्व से लेकर न जाने कितनी जातियां और संस्कृतियों की धार्मिक परंपराओं रीतियों-नीतियों, विष्वसों एवं उत्सवों एवं व्रतों को समाप्त करती हुई आज इस स्थिति में पहुंची है।
- संसार में आज भी अपने शुद्ध रूप में विद्यमान क्या है?
उत्तर- संसार में आज भी अपने शुद्ध रूप में यदि कुछ विद्यमान है तो वह है मनुष्य की प्रत्येक विषम परिस्थिति में जीवित रहने की इच्छा।
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