UP Board Class 12 Question Bank 2026 : Gyansindhu Pariksha Prahar General Hindi सामान्य हिंदी की क्वेश्चन बैंक 2026 (Full Book – PAGE-22)
अशोक के फूल -हजारीप्रसाद द्विवेदी (Part-3)
(5) अशोक का वृक्ष जितना भी मनोहर हो, जितना भी रहस्यमय हो, जितना भी अलंकारमय हो, परन्तु है वह उस विशाल सामंत सभ्यता की परिष्कृत रुचि का ही प्रतीक, जो साधारण प्रजा परिश्रमों पर पली थी, उसके रक्त के संसार- कणों को खाकर बड़ी हुई थी और लाखों-करोड़ों की उपेक्षा से जो समृद्ध हुई थी। वे सामन्त उखड़ गये, समाज ढह गए, और मदनोत्सव की धूमधाम भी मिट गयी। सन्तान-कामिनियों को गन्धर्वो से अधिक शक्तिशाली देवताओं का वरदान मिलने लगा-पीरों ने, भूत-भैरवों ने, काली-दुर्गा ने यक्षों की इज्जत घटा दी। दुनिया अपने रास्ते चली गई, अशोक पीछे छूट गया।
उपर्युक्त गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
- सामन्त सभ्यता की परिष्कृत रुचि का प्रतीक कौन है?
उत्तर- सामन्त सभ्यता की परिष्कृत रुचि का प्रतीक ‘अशोक का वृक्ष’ है।
- लाखों-करोड़ों की उपेक्षा से कौन समृद्ध हुई थी?
उत्तर- लेखक के अनुसार लाखों-करोड़ों (व्यक्तियों) की उपेक्षा से सामंतवाद समृद्ध हुआ था।
- आज उस सामंती सभ्यता की क्या स्थिति है?
उत्तर- लेखक के अनुसार आज उस सामंती सभ्यता की स्थिति यह है कि वे उखड़ गये हैं, उनका समाज ढह गया है और उनके विलासितापूर्ण जीवन की धूमधाम मिट गयी।
- रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- रेखांकित अंश की व्याख्या- लेखक का कहना है कि संसार का नियम है कि जो वस्तु अथवा परम्परा है, वह समय के साथ परिवर्तन होता ही है। कुछ समय पश्चात् उसके स्वरूप में आमूल-चूल परिवर्तन होकर वह एक भिन्न रूप में हमारे सामने होती है। यही बात संस्कृति के सन्दर्भ में भी होती है। यही कारण है कि कभी सम्राटों और सामन्तों ने जिस विलासी और चाटुकार संस्कृति को जन्म दिया था, वह मन को लुभानेवाली और व्यक्ति को उन्मत्त करने वाली संस्कृति धीरे-धीरे समाप्त हो गई।
- पाठ का शीर्षक तथा लेखक का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर- पाठ के शीर्षक का नाम ‘अशोक के फूल’ तथा लेखक का नाम हजारी प्रसाद द्विवेदी है।
- अशोक का वृक्ष किसका प्रतीक है?
उत्तर- अशोक सामंत सभ्यता की परिष्कृत रुचि का प्रतीक था।
- सामंत सभ्यता किसके आधार पर पली-बढ़ी?
उत्तर- सामन्त सभ्यता साधारण प्रजा के परिश्रमों पर पली थी, उसके रक्त के संसार-कणों को खाकर बड़ी हुई थी और लाखों-करोड़ों की उपेक्षा से समृद्ध हुई थी।
- सन्तान-कामिनियों को किसका वरदान प्राप्त होने लगा?
उत्तर- सन्तान-कामिनियों को गंधर्वो से अधिक शक्तिशाली देवताओं का वरदान मिलने लगा।
- यक्षों की प्रतिष्ठा किसने घटा दी?
उत्तर- यक्षों की प्रतिष्ठा पीरों, भूत-भैरवों एवं काली दुर्गा ने घटा दी।
- अशोक के वृक्ष की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर- अशोक का वृक्ष मनोहर, रहस्यमय एवं अलंकारमय है।
- सामन्त सभ्यता से क्या तात्पर्य है?
उत्तर- सामन्त सभ्यता से तात्पर्य है- सामन्तों का शासन।
- सन्तान कामिनियों को किसका शक्तिशाली वरदान मिलने लगा?
उत्तर- सन्तान कामिनियों को देवताओं का शक्तिशाली वरदान मिलने लगा।
- गद्यांश में प्रयुक्त भाषा और शैली स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भाषा सरल, सहज विसयानुरूप खड़ी बोली है। शैली वर्णनात्मक है।
- कौन उखड़ और ढह गया है?
उत्तर- सामन्तवादी व्यवस्था समाप्त हो चुकी है तथा ऐसी शोषक व्यवस्था पर आधारित समाज भी अब ढह गये हैं।
- अशोक के वृक्ष की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर- अशोक के वृक्ष की विशेषताएँ हैं कि वह मनोहर, रहस्यमय और अलंकारमय है।
- अशोक क्यों पीछे छूट गया?
उत्तर- पीरों, भूत-भैरवों और काली-दुर्गा ने यक्षों की इज्जत घटा दी और दुनिया अपने रास्ते चली गई; इससे अशोक पीछे छूट गया।
- ‘परिष्कृत’ और ‘समृद्ध’ शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर- ‘परिष्कृत’ का अर्थ है- सजाया हुआ, संस्कार किया गया और ‘समृद्ध’ का अर्थ है- फलता-फूलता हुआ।
- ‘‘अशोक का वृक्ष जितना भी मनोहर हो, जितना भी रहस्यमय हो।“ इस वाक्यांश में किस रहस्य की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर- वाक्यांश में इस रहस्य की ओर संकेत किया गया है कि अशोक के वृक्ष की पूजा इसलिए भी की जाती रही थी कि उसे सन्तान सम्बन्धी मनोकामना को पूर्ण करनेवाला भी माना जाता रहा था। सन्तान की कामना करनेवाली स्त्रियाँ अब अशोक के वृक्ष की शरण में जाकर उसकी पूजा नहीं करतीं।
- प्रस्तुत गद्यांश के अनुसार सामन्त क्यों उखड़ गए?
उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश के अनुसार सामन्त इसलिए उखड़ गए अथवा उनका अस्तित्व इसलिए समाप्त हो गया; क्योंकि वे जिन किसान, मजदूरों का खून चूसकर स्वयं को समृद्ध बनाते रहे, वे आम जनता के लोग, किसान और मजदूर समय के परिवर्तन के साथ ही अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गए।
(6) रवीन्द्रनाथ ने इस भारतवर्ष को महामानवसमुद्र कहा है। विचित्र देश है वह! असुर आए, आर्य आए, शक आए, हूण आए, नाग आए, यक्ष आए, गन्धर्व आए, न जाने कितनी मानव जातियाँ यहाँ आईं और आज के भारतवर्ष को बनाने में अपना हाथ लगा गईं। जिसे हम हिन्दू रीति-नीति कहते हैं ‘वह अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का अद्भुत मिश्रण हैं।’
व्याख्या- गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारतवर्ष को महामानवों का समुद्र कहा है। यहाँ मानवता का पोषण करनेवाले महापुरुषों की एक लम्बी परम्परा है। हमारा यह देश बड़ा विचित्र है; क्योंकि यहाँ के कण-कण में विभिन्न संस्कृतियों का वैविध्य रचा-बसा है। इसका कारण यह है कि इसके निर्माण में असुरों से लेकर आर्य, शक, हूण, नाग, यक्ष और गन्धर्व जातियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। हमारा इतिहास इन सब जातियों के दुनिया के अलग-अलग कोनों से आकर यहाँ बसने की पुष्टि करता है। इन सभी मानव जातियों ने अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनुसार इस देश को सजाया सँवारा, जिसके समन्वित रूप को आज हिन्दू रीति-नीति के नाम से जाना जाता है।
- पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर- पाठ का शीर्षक-अशोक के फूल । लेखक का नाम- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ।
- रवीन्द्रनाथ ने किसे महामानवसमुद्र कहा है?
उत्तर- रवीन्द्रनाथ ने भारतवर्ष को महामानवसमुद्र कहा है।
- रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- उपर्युक्त व्याख्या के अन्तर्गत मोटे अक्षरों में छपा व्याख्यांश देखिए ।
- भारतवर्ष के निर्माण में किन-किन का सहयोग रहा है?
उत्तर- भारतवर्ष के निर्माण में असुर, आर्य, शक, हूण, नाग, यक्ष और गन्धर्व मानव-जातियों का सहयोग रहा है।
- आर्य, शक, हूण कहाँ आए?
उत्तर- आर्य, शक और हूण विश्व के अलग-अलग भागों से भारत आए।
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