UP Board Solution of Class 9 Hindi Chapter -4 – Bhartendu Harishchand – Prem madhuri – पाठ – 4 भारतेंदु हरिशचन्द -प्रेम माधुरी (काव्य खंड) Bhartendu- प्रश्न -उत्तर Padyansh ke Prashn Uttar-gyansindhuclasses

UP Board Solution of Class 9 Hindi Chapter -4 – Bhartendu Harishchand – Prem
madhuri – पाठ – 4 भारतेंदु हरिशचन्द -प्रेम माधुरी  (काव्य खंड) Bhartendu – प्रश्न -उत्तर Padyansh ke Prashn Uttar-gyansindhuclasses

Chapter -4 – Bhartendu Harishchand – Premmadhuri

UP Board Solution of Class 9 Hindi Chapter -4 – Bhartendu Harishchand – Prem
madhuri – पाठ – 4 भारतेंदु हरिशचन्द -प्रेम माधुरी  (काव्य खंड) Rahim – प्रश्न -उत्तर Gadyansh ke Prashn Uttar-gyansindhuclasses – based on up board new syllabus according to new education policy 2020.

चैप्टर 4- भारतेंदु हरिश्चंद्र – प्रेम माधुरी-  पद्यांश आधारित प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. निम्नलिखित पद्यांशों पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए–

(क) कूकै लगीं कोइलैं कदंबन पै बैठि फेरि

              धो-धो पात हिलि-हिलि सरसै लगे ।

      बोलै लगे दादुर मयूर लगे नाचै फेरि

               देखि के सँजोगी- जन हिय हरसै लगे । ।

      हरी भई भूमि सीरी पवन चलन लागी

               लखि ‘हरिचंद’ फेरि प्रान तरसै लगे ।

      फेरि झूमि- झूमि बरषा की रितु आई फेरि

                बादर निगोरे झुक झुकि बरसै लगे । ।

 प्रश्न- (i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर- (i) प्रस्तुत पद्यांश भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम-माधुरी’ से लिया गया है।

प्र.(ii) कोयलें किस वृक्ष पर बैठकर कूक रही हैं?

उ.वर्षा ऋतु आने पर कोयलें कदम्ब के वृक्षों पर बैठकर कूक रही हैं।

प्र.(iii) उपर्युक्त पद्यांश में किस ऋतु के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है?

उ. उपर्युक्त पद्यांश में वर्षा ऋतु के सौन्दर्य का वर्णन है ।

Chapter -4 – Bhartendu Harishchand – Premmadhuri

(ख) जिय पै जु होइ अधिकार तो बिचार कीजै

             लोक-लाज, भलो-बुरो, भले निरधारिए ।

      नैन, श्रौन, कर, पग, सबै पर बस भए

              उतै चलि जात इन्हें कैसे कै सम्हारिए ।

      ‘हरिचंद’ ‘भई सब भाँति सों पराई हम

              इन्हें ज्ञान कहि कहो कैसे कै निबारिए ।

      मन में रहै जो ताहि दीजिए बिसारि, मन

              आपै बसै जामेँ ताहि कैसे कै बिसारिए ||

प्रश्न- (i) प्रस्तुत पंक्तियों में गोपियाँ किससे कह रही हैं?

उत्तर- (i) प्रस्तुत पंक्तियों में गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं।

प्र.(ii) गोपियों के नेत्र, कान, हाथ, पैर सभी किसके वश में हो गये हैं?

उ. गोपियों के नेत्र, कान, हाथ, पैर सभी भगवान श्रीकृष्ण के वश में हो गये हैं।

प्र.(iii) गोपियों के अनुसार कृष्ण को क्यों नहीं भुलाया जा सकता है ?

उ.गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं कि जो मन में बसा हो, उसे तो भुलाया जा सकता है किन्तु स्वयं मन जिसमें बसा हो उसे कैसे भुलाया जा सकता है अर्थात् मन पूरी तरह से भगवान श्रीकृष्ण में बस गया है। अतः भगवान श्री कृष्ण को भुलाना संभव नहीं है।

(ग) ऊधौ जू सूधो गहो वह मारग, ज्ञान की तेरे जहाँ गुदरी है

     कोऊ नहीं सिख मानिहै ह्याँ, इक स्याम की प्रीति प्रतीति खरी है ।।

     ये ब्रजबाला सबै इक सी, हरिचंद जू मण्डली ही बिगरी है

     एक जौ होय तो ज्ञान सिखाइए कूप ही में यहाँ भाँग परी है।

प्रश्न- (i) गोपियाँ किससे कह रही हैं ?

उत्तर- (i) इस सवैये में गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं।

प्र.(ii) ‘यहाँ तो कुएँ में ही भाँग पड़ी हुई हैं’ का आशय स्पष्ट कीजिए ।

उ. ब्रज बालाएँ उद्धव से कह रही हैं कि यहाँ की गोपिकाओं की पूरी मण्डली ही बिगड़ी हुई है। यदि किसी एक गोपी की बात होती तो तुम उसे ज्ञान का उपदेश देते किन्तु यहाँ तो कुएँ में ही भाँग पड़ी हुई है अर्थात् सभी श्रीकृष्ण के प्रेम रस में सराबोर होकर पागल सी ही गयी हैं।

प्र.(iii) गोपियाँ किसके प्रेम रस में डूबी हुई हैं?

उ. गोपियाँ श्रीकृष्ण के प्रेम रस में डूबी हुई हैं।

(घ) सखि आयो बसंत रितून को कंत, चहूँ दिसि फूलि रही सरसों ।

     बर सीतल मंद सुगंध समीर सतावन हार भयो गर सों ।।

     अब सुंदर साँवरो नंद किसोर कहै ‘हरिचंद’ गयो घर सों ।

      परसों को बिताय दियो बरसों तरसों कब पाँय पिया परसों ।।

प्रश्न- (i) प्रस्तुत पद्यांश में किस ऋतु का वर्णन है ?

उत्तर- (i) प्रस्तुत सवैये में बसन्त ऋतु का वर्णन है।

प्र.(ii) गोपियाँ किसके वियोग में दुःखी हैं ?

उ.गोपियाँ श्रीकृष्ण की विरह व्यथा से पीड़ित हैं ।

प्र.(iii) बसन्त ऋतु के सौन्दर्य पर दो पंक्तियाँ लिखिए।

उ. बसन्त ऋतु के आगमन पर चारों तरफ पीली-पीली सरसों फूली रहती है।

(b) अत्यन्त सुन्दर, शीतल, मन्द और सुगन्धित वायु बह रही है ।

Chapter -4 – Bhartendu Harishchand – Premmadhuri

(ङ) इन दुखियान को न चैन सपनेहुँ मिल्यो,

               तासों सदा व्याकुल बिकल अकुलायँगी ।

     प्यारे हरिचंदजू की बीती जानि औधि, प्रान,

               चाहत चले पै ये तो संग ना समायँगी ।।

     देखौ एक बारहू न नैन भरि तोहिं यातें

               जौन जौन लोक जैहैं तहाँ पछतायँगी

     बिना प्रान-प्यारे भये दरस तुम्हारे हाय

                मरेहू पै आँखें ये खुली ही रहि जायँगी ।

प्रश्न- (i) प्रस्तुत पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर- (i) प्रस्तुत पद्यांश भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘प्रेम-माधुरी’ से उद्धृत है ।

प्र.(ii) गोपियाँ उद्धव से कृष्णजी के पास क्या सन्देशा भिजवा रही हैं ?

उ. गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं कि हे उद्धव ! कृष्ण के पास जाकर यह सन्देश देना कि गोपियों के नेत्र मृत्यु के पश्चात् भी तुम्हारे दर्शन की प्रतीक्षा में खुले रहेंगे ।

प्र.(iii) प्रस्तुत छन्द में कौन-सा रस है ?

उ. प्रस्तुत छन्द में वियोग श्रृंगार है।

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