Class 11 Hindi Kavyanjali [kavyakhand] काव्यांजलि Chapter 6 कविवर बिहारी – Bhakti evam Shringar भक्ति एवं श्रृंगार की व्याख्या

UP Board Solution Of Class 11 Hindi Kavyanjali [kavyakhand] काव्यांजलि Chapter 6 कविवर बिहारी – Bhakti evam Shringar भक्ति एवं श्रृंगार की व्याख्या

UP Board Solution Of Class 11 Hindi Kavyanjali [kavyakhand] काव्यांजलि Chapter 6 कविवर बिहारी – Bhakti evan Shringar भक्ति एवं श्रृंगार की व्याख्या। 

Board | बोर्ड UP Board (UPMSP)
Class | कक्षा 11th (XI)
Subject  | विषय Hindi | हिंदी कक्षा ११वी  (काव्यांजलि) 
Topic | शीर्षक कबीर सखी के पद्यांशो पर आधारित प्रश्नोत्तर
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समस्त पद्यांशों की व्याख्या- भक्ति एवं श्रृंगार

[1] करौ कुबत जगु, कुटिलता तजौं न, दीनदयाल।

     दुखी होहुगे सरल हिय बसत, त्रिभंगी लाल।।

शब्दार्थ कुबत = निन्दा; बुराई। कुटिलता = बुराई। त्रिभंगी लाल = श्रीकृष्ण।

सन्दर्भ – प्रस्तुत दोहा कविवर बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ से हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘भक्ति एवं श्रृंगार’ शीर्षक काव्यांश से उधृत है।

प्रसंग – इस दोहे में बिहारी ने अपने और श्रीकृष्ण की त्रिभंगी छवि में साम्य स्थापित करते हुए कहा है-

व्याख्या- हे प्रभु! चाहे संसार मेरी कितनी भी निन्दा करे, परन्तु मैं अपनी कुटिलता (बुराइयों) को नहीं छोडूंगा; क्योंकि हे दीनों पर दया करनेवाले प्रभु! आप त्रिभंगीलाल हैं; अर्थात् वंशी बजाते समय आप अपने पैर, कमर और गर्दन तीन जगह से टेढ़े हो जाते हैं। यदि मैं अपनी कुटिलता (बुराइयों या टेढ़ेपन) को छोड़कर सीधा और सरल हो गया तो आपको मेरे सरल हृदय में बसने में कष्ट होगा; क्योंकि टेढ़ी वस्तु टेढ़े स्थान में ही समा सकती है, सीधे स्थान में सुविधापूर्वक नहीं समा सकती। कविवर बिहारी श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मूर्ति को ही अपने हृदय में बसाना चाहते हैं। इसीलिए वे सरल न बनकर कुटिल (टेढ़े) ही बने रहना चाहते हैं।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा – ब्रजभाषा, शैली- मुक्तक, अलंकार – ‘त्रिभंगीलाल’ में परिकरांकुर एवं अनुप्रास, रस  – भक्ति,  छन्द-दोहा।

[2] अजौं तर्यौना ही रह्यौ श्रुति सेवत इक रंग।

     नाक बास बेसरि लह्यौ बसि मुकतनु कैं संग।।

शब्दार्थ  – अजौं = आज तक। तरय्यौना =  कान का आभूषण,  तरय्यो ना = जिसका उद्धार नहीं हो सकता, अधोवर्ती अर्थात् तुच्छ। श्रुति =  कान,  शास्त्र। नाक  नासिका,  स्वर्ग। बेसरि =  नाक का एक आभूषण,  अत्यन्त नीच व्यक्ति। मुकतनु  मोती,  सज्जन पुरुष।

प्रसंग – प्रस्तुत दोहे में कवि ने नाक और कान के आभूषण के माध्यम से सत्संगति की महिमा का वर्णन किया है।

व्याख्या- आभूषण के पक्ष में- निरन्तर कानों का सेवन करने पर भी कान का आभूषण (तरय्यौना) निम्न स्थान पर ही रहा; अर्थात् आज तक भी उसका उद्धार न हो सका, जबकि नाक के आभूषण (बेसरि) ने मोतियों के साथ बसकर नाक के उच्च स्थान को प्राप्त कर लिया।

सत्संगति के पक्ष में- सत्संगति की महिमा का वर्णन करते हुए कविवर बिहारीलाल ने लिखा है कि वेदों का निरन्तर और तल्लीनतापूर्वक अध्ययन करनेवाले व्यक्ति का उद्धार अभी तक नहीं हुआ, किन्तु मूर्ख व्यक्ति ने मुक्त (संसार की वासनाओं को त्याग देनेवाले) व्यक्ति का सत्संग करके स्वर्ग को प्राप्त कर लिया।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा – ब्रजभाषा।  शैली-मुक्तक।  अलंकार – श्लेष एवं अन्योक्ति।  रस  – शान्त।  छन्द– दोहा।   

[3] मकराकृति गोपाल कैं सोहत कुंडल कान।

     धर्यो मनौ हिय घर समरु ड्यौढ़ी लसत निसान।

शब्दार्थ  – मकराकृति = मकर की आकृतिवाले। धर्यो अपने अधिकार में कर लिया; जीत लिया। समरु = कामदेव। ड्यौढ़ी = मुख्य द्वार। निसान = पताका।

प्रसंग-इस दोहे में कवि बिहारी ने कुण्डल को धारण किए हुए श्रीकृष्ण की सुन्दरता का वर्णन किया है।

व्याख्या- एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी! श्रीकृष्ण के कानों में मकर की आकृति के कुण्डल सुशोभित हो रहे हैं। इनको देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो कामदेव ने श्रीकृष्ण के हृदयरूपी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया है और मुख्य द्वार (कान) पर यह (मकर के रूप में) उसकी विजय-पताका लहरा रही है।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा – ब्रजभाषा।  शैली-मुक्तक ।  अलंकार– उत्प्रेक्षा एवं रूपक।  रस  श्रृंगार ।  छन्द– दोहा।

 [4] बतरस-लालच लाल की, मुरली-धरी लुकाइ।

      सौंह करै भौंहनु हँसै, दैन कहैं नटि जाइ।।

शब्दार्थ  – बतरस  = बातें करने का आनन्द। लुकाइ = छिपाकर। सौंह शपथ; कसम। नटि जाइ = मना कर देती है; मुकर जाती है।

प्रसंग – इस दोहे में बिहारी राधा की प्रेमपूर्ण मुद्राओं का वर्णन करते हुए कहते हैं-

व्याख्या- राधाजी ने श्रीकृष्ण से बात करने के आनन्द के लालच से उनकी मुरली छिपाकर रख दी। श्रीकृष्ण ने पूछा कि क्या मुरली तुम्हारे पास है तो राधा कसम खाने लगीं (कि हमारे पास मुरली नहीं है); परन्तु भौहों में हँसने लगीं अर्थात् उनके नेत्र हँस रहे थे (जिससे स्पष्ट ज्ञात होता था कि मुरली इन्हीं के पास है)। जब श्रीकृष्ण ने उनसे मुरली देने के लिए कहा तो राधा ने अपने पास मुरली होने की बात से ही इनकार कर दिया (इस प्रकार यह क्रम देर तक चलता रहा।)

काव्य-सौन्दर्य-  प्रथम पंक्ति में राधा की मुरली के प्रति ईर्ष्या का संकेत भी मिलता है; क्योंकि श्रीकृष्ण मुरली बजाने के कारण उनसे बात नहीं करते थे और वे श्रीकृष्ण से बातों का आनन्द लेना चाहती थीं।  भाषा– ब्रजभाषा। शैली– मुक्तक।  अलंकार-कारक, दीपक और अनुप्रास।  रस  – संयोग श्रृंगार।  छन्द-दोहा।

[5] कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।

      भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सौं बात।।

शब्दार्थ – नटत = मना कर देना। भौन भवन, घर। सौं = से।

प्रसंग- इस दोहे में कवि ने नायिका द्वारा नेत्रों के माध्यम से की गई बातों का वर्णन किया है।

व्याख्या-नेत्रों के संकेत से नायक ने नायिका से एकान्त में मिलने के लिए कहा, परन्तु नायिका ने मना कर दिया। नायिका के मना करने की इस चेष्टा पर नायक रीझ गया (मुग्ध हो गया)। यह देखकर नायिका खीझ गई। इसी समय दोनों के नेत्र मिल गए और दोनों प्रसन्न हो गए। तभी (घर में अन्य लोगों की उपस्थिति के ध्यान से) दोनों लज्जित हो गए। इस प्रकार भरे हुए भवन (घर) में वे दोनों नेत्रों से ही बातें कर रहे हैं।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा-ब्रजभाषा।  शैली-मुक्तक।  अलंकार– अनुप्रास एवं विभावना।  रस – संयोग श्रृंगार। छन्द-दोहा।

[6] कर लै, चूमि, चढ़ाइ सिर, उर लगाइ, भुज भेटि।

      लहि पाती पिय की लखति, बाँचति, धरति समेटि।

शब्दार्थ  – कर = हाथ। उर छाती। भेटि लगाया; लिपटाया। पाती पत्र। लखति = देखती।

प्रसंग – इस दोहे में कविवर बिहारी ने प्रोषितपतिका नायिका की दशा का अत्यन्त मनोरम वर्णन किया है।

व्याख्या-नायक ने नायिका को पाति (पत्र) भेजी है। इस पाति को पाकर नायिका की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने पाति को हाथ में लेकर सबसे पहले उसे चूमा, फिर उसे पवित्र मानकर सिर अर्थात् माथे से लगाया। इसके पश्चात् उसने उसे अपनी भुजाओं में भरकर अपनी छाती से ऐसे लिपटाया, मानो वह साक्षात् नायक हो। अपने प्रियतम की उस पाति को वह नायिका कभी तो अत्यन्त स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखती है, कभी उसे पढ़ती है और कभी उसे सँभालकर बन्द करके अत्यन्त सुरक्षित स्थान पर रख देती है।

काव्य सौन्दर्य-   भाषा-व्रजभाषा।  शैली– मुक्तक।  अलंकार अनुप्रास।  रस – विप्रलम्भ श्रृंगार।  छन्द-दोहा।

[7] अंग-अंग-नग जगमगत दीप सिखा सी देह।

     दिया बढ़ाऐं हूँ रहै, बड़ौ उज्यारौ गेह।।

शब्दार्थ  – दीप सिखा = दीपक की लौ। बढ़ाएँ हूँ बुझाने पर भी। गेह= घर।

प्रसंग- नायिका ने अपने प्रत्येक अंग पर भिन्न-भिन्न प्रकार के रत्नजड़ित आभूषण पहने हुए हैं। आभूषणों के रत्नों में उसके शरीर की कान्ति प्रतिबिम्बित हो रही है।

व्याख्या-बिहारी नायिका के अंगों की आभा की प्रशंसा करते हुए कह रहे हैं कि नायिका ने अपने प्रत्येक अंग पर रत्नजड़ित आभूषण धारण कर रखे हैं। दीपशिखा के समान उसके अंगों की आभा रत्नों में झलकती हुई सारे कक्ष में फैली हुई है। यह प्रकाश इतना अधिक है कि दीपक बुझा देने पर भी कक्ष पूरी तरह से जगमगाता रहता है।

काव्य-सौन्दर्य- भाषा – ब्रजभाषा।  अलंकार– पुनरुक्तिप्रकाश, उपमा।  गुण-माधुर्य।  शब्दशक्ति – लक्षणा।  रस  – श्रृंगार। (८) छन्द-दोहा।

Bhakti evam sringar bihari [भक्ति एवं श्रृंगार]

[8] सहज सेत पँचतोरिया पहिरत अति छबि होति।

     जल चादर के दीप लौं जगमगाति तन-जोति।।

शब्दार्थ  – सहज = स्वाभाविक। सेत = श्वेत। पँचतोरिया = पाँच तोले का; एक प्रकार का अत्यन्त बारीक रेशमी वस्त्र। जल चादर पानी की गिरती हुई फुहार की चादर।

प्रसंग – प्रस्तुत दोहे में नायिका के शारीरिक सौन्दर्य और उसकी कान्ति का चित्रण इस उद्देश्य से किया गया है कि उसे सुनकर नायक उसकी ओर आकर्षित हो जाए।

व्याख्या-स्वाभाविक रूप से श्वेत और रेशम की हल्की साड़ी पहने हुए उस नायिका की सुन्दरता अत्यधिक बढ़ जाती है। इस वेश में उसकी अंग-कान्ति का आलोक ऐसा प्रतीत होता है जैसे जल-चादर के पीछे दीपकों की पंक्ति प्रज्वलित हो रही हो।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा – ब्रजभाषा।  अलंकार (क) ‘सहज सेत’ में छेकानुप्रास, (ख) सम्पूर्ण दोहे में उपमा।  रस  – श्रृंगार।  शब्दशक्ति – लक्षणा।  गुण-माधुर्य। (८) छन्द-दोहा।

[9] कंज-नयनि मंजनु किए, बैठी ब्यौरति बार।

      कच-अँगुरी-बिच दीठि दै, चितवति नंदकुमार।।

शब्दार्थ – कंज-नयनि = कजरारे नयनों वाली। मज्जनु = स्नान। ब्यौरति सुलझती है। कच = बाल। दीठि है = दृष्टि डालकर। चितवति = देख रही है।

प्रसंग-एक सखी दूसरी से नायिका प्रियतम को देखने की चतुराई का वर्णन इस दोहे में कर रही है।

व्याख्या- यह कजरारे नयनों वाली नायिका स्नान किए बैठी धूप में अपने बाल सुलझा रही है। इसी बहाने से बालों के मध्य में उँगलियाँ डालकर उनके मध्य में दृष्टि डालती हुई नन्दकुमार अर्थात् अपने प्रियतम को देख रही है।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा– ब्रजभाषा। अलंकार -अनुप्रास।  रस – श्रृंगार।  शब्दशक्ति– अभिधा।  गुण- माधुर्य।  छन्द– दोहा।

[10] औंधाई सीसी, सु लखि बिरह-बरनि बिललात।

       बिच ही सूखि गुलाबु गौ, छीटौ छुई न गात ।।

शब्दार्थ  – औंधाई = उलट दी। लीख देखकर। बिच = बीच में ही। गुलाब गौ गुलाब-जल।

प्रसंग- इस दोहे में विरह ज्वाला में दग्ध नायिका की मार्मिक दशा का आलंकारिक वर्णन हुआ है।

व्याख्या- हे सखी! विरह की ज्वाला में जलती हुई उस नायिका की दशा अत्यन्त करुणाजनक है। उसकी विरहाग्नि की लपटें इतनी प्रचण्ड हैं कि हमने उसकी तपन को कम करने के लिए गुलाब जल की सारी शीशी उलट दी, परन्तु तपन की अधिकता के कारण वह गुलाब जल तो बीच में ही सूख गया। उसके शरीर से तो गुलाब-जल के एक छींटे का भी स्पर्श नहीं हो पाया।

काव्य-सौन्दर्य- भाषा – सरल, सरस  व कोमल साहित्यिक ब्रजभाषा। शैली– मुक्तक ।  अलंकार – अतिशयोक्ति।  गुण – माधुर्य।  छन्द-दोहा।

[11] करी बिरह ऐसी, तऊ गैल न छाड़तु नीचु।

      दीनैं हूँ चसमा चखनु चाहै लहैं न मीचु।

शब्दार्थ  – तऊ = तब भी। गल पीला। नीचु नीच। चसमा चश्मा।

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में विरहिणी नायिका की करुण वेदना की अभिव्यक्ति हुई है।

व्याख्या- विरहिणी नायिका के प्रियतम के समक्ष, नायिका की सार्मिक दशा का वर्णन करती हुई सखी कहती है कि विरह के कारण मेरी सखी की दशा अत्यन्त दुःखद हो गई है, परन्तु नीच विरह अब भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है। अब तो विरह में सूखकर वह इतनी कमजोर हो गई है कि मृत्यु भी उसे आँखों पर चश्मा लगाकर खोजती फिरती है, परन्तु फिर भी वह उसे नहीं देख पाती। अभिप्राय यह है कि वह अब तक मर जाती, परन्तु वह केवल इसलिए अभी तक जीवित बची है कि मृत्यु उसे नहीं देख पा रही है।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा-सरल, सरस , साहित्यिक ब्रजभाषा। शैली – मुक्तक ।  अलंकार – अनुप्रास व अतिशयोक्ति।  गुण-माधुर्य।  छन्द-दोहा।

[12] पिय कैं ध्यान गही गही रही वही ह्वै नारि।

      आपु आपु ही आरसी लखि रीझति रिझवारि।।

शब्दार्थ  – आरसी = दर्पण। रिझवारि (रूप-गुण पर) रीझने वाली।

प्रसंग – नायक के ध्यान में मग्न नायिका की मनोवृत्ति नायकरूप हो गई है। वह अपना प्रतिबिम्ब दर्पण में देखकर उसको नायक समझकर उस पर रीझ रही है। इसी का वर्णन इस दोहे में किया गया है।

व्याख्या-एक सखी दूसरी को प्रियतम पर आसक्त देखकर अन्य सखी से कह रही है कि अपने प्रियतम का ध्यान करती हुई वह नायिका (नारी) वही (प्रियतम रूप) हो रही है, इसी कारण यह दर्पण में स्वयं के प्रतिबिम्ब को देखकर (उसे नायक समझकर उसके रूप-गुण पर) रीझने वाली यह स्वयं पर ही रीझ रही है।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा– ब्रजभाषा।  शैली-मुक्तक।  अलंकार-वीप्सा एवं अनुप्रास।  रस – विप्रलम्भ श्रृंगार।  छन्द-दोहा।

[13] जोग-जुगति सिखए सबै मनौ महामुनि मैन।

       चाहत पिय-अद्वैतता काननु सेवत नैन।  

शब्दार्थ- जोग-जुगति = योग की युक्तियाँ; मिलने के उपाय। मैन कामदेव। पिय-अद्वैतता = प्रिय से सिकर एक हो जाना; ब्रह्म से एकाकार। काननु सेवत = वन का सेवन करनेवाले; कानों तक लम्बे।

प्रसंग-इस दोहे में कवि ने नायिका के प्रभावशाली नेत्रों का वर्णन किया है।

व्याख्या-सखी नायिका से कहती है कि हे सखी! (यौवन से परिपूर्ण हो जाने पर अब तुम्हे) कामदेवरूपों महामुनि ने योग-साधना की (नायक से मिलने की) सारी विधियाँ तुम्हें अच्छी प्रकार सिखा दी हैं। इसलिए कानों तक लम्बे या कानों तक फैले हुए (वन का सेवन करनेवाले) तुम्हारे ये नेत्र नायक से मिलकर एक हो जाना (ब्रह्म से एकाकार होना) चाहते हैं; अर्थात् जिस प्रकार कोई साधक योग-साधना की सभी विधियाँ सीखकर ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए वैराग्य आदि धारण करके वन को चला जाता है, उसी प्रकारं नायिका के नेत्र, जो यौवन के आगमन पर नायक से मिलने की अनेक विधियों को सीख गए हैं, अब नायक से मिलने के लिए व्याकुल हैं। इसी अभिलाषा से अब वे कानों तक फैल गए हैं।

काव्य-सौन्दर्य–  भाषा-ब्रजभाषा।  शैली-मुक्तक।  अलंकार-श्लेष, उत्प्रेक्षा एवं रूपक।  रस-श्रृंगार।  छन्द-दोहा।

[14] मूड़ चढ़ाऐंऊ रहै पस्यौ पीठि कच-भारु।

     रहै गरैं परि, राखिबौ तऊ हियैं पर हारु।।

शब्दार्थ – मूड़ चढ़ाएँऊ = सिर पर धारण करना; उच्च पद होना। कच-भारु = बालों का बोझ। तऊ = तब भी।

प्रसंग-इस दोहे में कवि बिहारी कहते हैं कि अयोग्य पुरुष श्रेष्ठ पद का अधिकारी नहीं हो सकता तथा गुणी को श्रेष्ठ पद मिलकर ही रहता है।

व्याख्या-बालों को लोग सिर चढ़ाकर रखते हैं तब भी बालों का गुच्छा पीठ पीछे ही रहता है, किन्तु हार गले में पड़ता है, तब भी वह हृदय पर धारण किया जाता है। इस प्रकार कवि यह समझाना चाहता है कि अयोग्य व्यक्ति कितना ही ऊँचा पद प्राप्त कर ले, फिर भी लोग उससे घृणा ही करते हैं, किन्तु योग्य व्यक्ति चाहे गले पड़ जाए; अर्थात् कष्ट भी दे, तब भी उसे छाती से लगाकर अर्थात् स्नेह और आदरपूर्वक रखा जाता है।

काव्य-सौन्दर्यभाषा– ब्रजभाषा। शैली– मुक्तक।  अलंकार अन्योक्ति।  रस – शान्त।  

समस्त पद्यांशों की व्याख्या- भक्ति एवं श्रृंगार

[15] रहौ, गुही बेनी, लखे गुहिबे के त्यौनार।

      लागे नीर चुचान, जे नीठि सुखाए बार।।

शब्दार्थ – गुही = गूंथना। त्यौनार ढंग, रीति। नीठि= कठिनता से।

प्रसंग-नायक नायिका की चोटी गूंथ रहा है। पारस्परिक स्पर्श से दोनों में स्वेद नामक सात्त्विक भाव उत्पन्न हो गया है, जिससे नायिका के बाल भीग गए हैं। नायिका अपना सात्त्विक भाव छिपाने के लिए नायक के वेणी गूंथने के ढंग में कमी निकालती हुई उससे वेणी न गूंथने के लिए कहती है।

व्याख्या-नायिका नायक से कहती है कि रहने दो, यह मेरी चोटी गूंथना बन्द करो। तुमसे यह चोटी नहीं गूंधी जाएगी, यह मैंने तुम्हारे चोटी गूंथने के ढंग को देखकर (जान) लिया है। देखो, मैंने जिन बालों को बड़ी कठिनता से सुखाया था, वे फिर से गीले हो गए हैं और उनसे पानी टपकने लगा है।

काव्य-सौन्दर्यभाषा-“ब्रजभाषा। शैली– मुक्तक।  अलंकार- व्याजोक्ति।  रस- संयोग श्रृंगार।  छन्द-दोहा।

[16] कर-मुँदरी की आरसी प्रतिबिंबित प्यौ पाइ।

      पीठ दियैं निधरक लखै, इकटक डीठि लगाइ।।

शब्दार्थ –कर-मुंदरी = हाथ की अँगूठी। प्यौ = प्रियतम। पाइ = पाकर, देखकर। निधरक = बेधड़क । डीठि लगाइ = दृष्टि लगाकर ।

प्रसंग-नायक को बेधड़क होकर देखने की नायिका की चातुरी का वर्णन करती हुई एक सखी दूसरी से

कहती है-

व्याख्या- हाथ की अँगूठी के दर्पण (नग) में प्रियतम का प्रतिबिम्ब देखकर, नायक की ओर पीठ किए बैठी नायिका एकटक दृष्टि से बेखटके उसको देख रही है। कहने का आशय यह है कि उसे इस बात की कोई शंका नहीं है कि मुझे प्रियतम को देखते हुए कोई देख रहा है।

काव्य-सौन्दर्य-   भाषा– ब्रजभाषा।  शैली– मुक्तक।  अलंकार-विभावना एवं अनुप्रास ।  रस  श्रृंगार ।  छन्द-दोहा।

[17] खेलन सिखए, अलि, भलैं चतुर अहेरी मार।

       कानन-चारी नैन-मृग नागर नरनु सिकार।।

शब्दार्थ  – अहेरी = शिकारी। मार = कामदेव। कानन-चारी  कानों तक विचरण करनेवाले अर्थात् दोर्ष नेत्र,  वन में विचरण करनेवाले। नैन-मृग = नेत्ररूपी हिरन। नागर = चतुर; नगर में रहनेवाले।

प्रसंग- इस दोहे में नायिका के नेत्रों की चतुराई का वर्णन किया गया है। सखी नायिका से कहती है-व्याख्या- हे सखी! कामदेवरूपी चतुर शिकारी ने कानों तक विचरण करनेवाले तुम्हारे इन नेत्ररूपी हिरनों को नगर में रहनेवाले चतुर लोगों का शिकार करना अच्छी प्रकार सिखा दिया है।

सामान्यतः शिकारी हिरन का शिकार करता है, परन्तु यहाँ नेत्ररूपी हिरन नगर-निवासी चतुर लोगों का शिकार कर रहे हैं। अभिप्राय यह है कि नायिका के नेत्र, जो कानों तक फैले हुए हैं, मृग-जैसे चंचल हैं तथा कटाक्ष आदि में निपुण हैं। हैं। नायिका अपने नेत्रों से जिस भी चतुर पुरुष की ओर देख लेती है, वह बिंध जाता है; अर्थात् घायल हो जाता है। यह सब कामदेव का प्रभाव है। जिस प्रकार कोई शिकारी अपने शिष्य को शिकार करने की कला सिखाता है, वैसे ही कामदेव ने नायिका को इस कला में निपुण कर दिया है; अर्थात् काम-भावना से प्रेरित होकर ही नायिका चतुर पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होती है।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा – ब्रजभाषा। शैली – मुक्तक।  अलंकार – रूपक, श्लेष एवं विरोधाभास।  रस -श्रृंगार।  छन्द-दोहा।

[18] ललन, सलोने अरु रहे अति सनेह सौं पागि।

      तनक कचाई देत दुख सूरन लौं मुँह लागि।।

शब्दार्थ  – सलोने = सुन्दर। सनेह से प्रेम से। कचाई = कच्चा। सूरन = जमीकन्द। प्रसंग – प्रस्तुत दोहे में रूठी हुई नायिका अपने घृष्ट नायक को उलाहना देती हुई कहती है-

व्याख्या- यद्यपि तुम सुन्दर भी हो और प्रेमी भी तथा तुम्हारे सौन्दर्य और प्रेम में भी कोई कमी नहीं है, तथापि तुम्हारा कपटपूर्ण व्यवहार उसी प्रकार दुःखदायी है, जिस प्रकार घी में भुनने तथा नमक डाले जाने पर भी जमीकन्द कच्चा ही रह जाता है और मुँह काट देता है। कच्चे जमीकन्द के समान तुम्हारा यह कपटपूर्ण व्यवहार अर्थात् दूसरी स्त्री के पास जाना और मुस्कराना मुझे अत्यन्त दुःख एवं पीड़ा दे रहा है।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा– ब्रजभाषा। अलंकार – श्लेष एवं उपमा।  रस – श्रृंगार।  छन्द-दोहा।

[19] अनियारे, दीरघ दृगनु किती न तरुनि समान।

      वह चितवनि औरे कछू, जिहिं बस होत सुजान।।

शब्दार्थ  – अनियारे = कोरदार, नुकीले। दीरघ दीर्घ, बड़े। चितवन = तिरछी दृष्टि वाली भंगिमा। सुजान = सौन्दर्य के पारखी, रसिक।

प्रसंग- इस दोहे में बताया गया है कि बाह्य-सौन्दर्य की दृष्टि से संसार की अनेक वस्तुएँ एकसमान हो सकती हैं, किन्तु सज्जनों अथवा चतुर रसिकों के मन को मोहने वाला आन्तरिक भाव-सौन्दर्य किसी-किसी में ही होता है। जैसे बड़ी-बड़ी और नुकीली आँखों वाली तो अनेक स्त्रियाँ इस संसार में विद्यमान हैं, किन्तु सौन्दर्य के कुशल पारखी उन सबमें अनुरक्त नहीं हो जाते, बल्कि वे तो उसी में अनुरक्त होते हैं, जिसमें एक विशेष प्रकार की चमक अथवा भावप्रवणता होती है।

व्याख्या-कोरदार अर्थात् नुकीली एवं बड़ी-बड़ी आँखों वाली कितनी ही युवतियाँ इस संसार में होती हैं, किन्तु सभी की चितवनें अर्थात् देखने की रीति और भू-भंगिमाएँ एक जैसी नहीं होतीं। वह चितवन कुछ और ही (अर्थात् विशेष प्रकार की) होती है (और किसी-किसी में ही पाई जाती है, सबमें नहीं), जिसके वशीभूत गुणीजन (रसिकजन) होते हैं।

काव्य-सौन्दर्य- भाषा– ब्रजभाषा।  शैली-मुक्तक।  अलंकार– व्यतिरेक एवं वक्रोक्ति।

[20]  क्यौं बसियै, क्यौ निबहियै, नीति नेह-पुर नाँहि।

        लगालगी लोइन करैं, नाहक मन बँधि जाँहि।।

शब्दार्थ  – बसियै = बसा जाए। निबहिये = निर्वाह किया जाए। नेह-पुर = प्रेमनगर। लगालगी = देखा-देखी, लगावट, घरा-घूरी। लोइन = नेत्र। नाहक = व्यर्थ में।

प्रसंग-प्रस्तुत दोहे में प्रेम की विचित्र रीति का मार्मिक चित्रण किया गया है।

व्याख्या- प्रेम के नगर में कोई नीति (न्यायपूर्ण शासन), नियम अथवा अनुशासन नहीं है, फिर उसमें किस प्रकार रहकर जीवन-निर्वाह किया जाए? यहाँ की अनीति का उदाहरण देखिए कि लगा-लगी तो लोचनरूपी चोर करते हैं अर्थात् टकराती तो निगाहें हैं और व्यर्थ में ही बँध बेचारा मन जाता है, जबकि उसका कोई अपराध नहीं होता।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा – ब्रजभाषा। शैली-मुक्तक।  अलंकार – असंगति और अनुप्रास।  रस – श्रृंगार।  छन्द– दोहा।

[21]  दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर-चित प्रीति।

        परति गाँठि दुरजन हियैं, दई, नई यह रीति।।

शब्दार्थ  – जुरत = जुड़ती है। हियै हृदय में। दई = दैव।

प्रसंग- इस दोहे में कवि ने प्रेम के परिणाम का वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि बिहारी कहते हैं कि जब नायक-नायिका के नेत्र उलझते हैं; अर्थात् उनमें परस्पर प्रेम उत्पन्न होता है, तब उनके कुटुम्ब टूट जाते हैं; अर्थात् नायक-नायिका का अपने-अपने कुटुम्ब से सम्बन्ध टूट जाता है और वे दोनों एक-दूसरे को ही अपना सबकुछ समझने लगते हैं। इस प्रकार चतुर प्रेमी-प्रेमिका के चित्त में गहरा प्रेम जुड़ जाता है। यह देखकर दुष्टों के हृदय में गाँठ पड़ जाती है; अर्थात् दुष्ट उनसे ईर्ष्या करने लगते हैं। कवि कहते हैं कि हे दैव (विधाता, प्रभु)! यह तो प्रेम की नई और विचित्र रीति है।

असंगति प्रदर्शित करते हुए कवि ने सिद्ध किया है कि उलझता कोई है, टूटता कोई और है। चित्त किसी का जुड़ता है और मन में गाँठ किसी और के पड़ जाती है; अर्थात् नेत्र प्रेमियों के उलझते हैं, परन्तु टूट कुटुम्ब जाते हैं। चित्त तो प्रेमियों के जुड़ते हैं और गाँठ दुर्जनों के हृदय में पड़ जाती है। प्रेम की यह रीति बहुत ही विचित्र है।

काव्य-सौन्दर्य-  भाषा – ब्रजभाषा। शैली-मुक्तक।  अलंकार – असंगति, श्लेष और अनुप्रास।  रस  – श्रृंगार।  छन्द-दोहा।  

 

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