Class 12  Hindi Khandkavy खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी Tyagpathi- Saransh Charitra Chitran kathavastu.

Class 12  Hindi Khandkavy खण्डकाव्य Chapter 5 त्यागपथी Tyagpathi- Saransh Charitra Chitran kathavastu.

Muktiyagy khandkavy

UP Board solution of Class 12  & sahitya Hindi खण्डकाव्य Chapter 5 “त्यागपथी” (रामेश्वर शुक्ल अंचल) is new syllabus of UP Board exam Class 12  Hindi.

Class12 Intermediate
SubjectHindi || General Hindi
BoardUP Board-UPMSP
Chapterत्यागपथी tyagpathee -Khandkavy

त्यागपथी (रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’)

आगरा, गोरखपुर, गाजीपुर, सुल्तानपुर, जालौन, बरेली, लखीमपुर-खीरी, गोंडा, शाहजहाँपुर, बाराबंकी, फिरोजाबाद तथा महाराजगंज जनपदों के लिए।

कथावस्तु

प्रश्न १ –’ त्यागपथी’ की कथावस्तु ( कथानक ) संक्षेप में लिखिए।

अथवा ‘त्यागपथी’ काव्य के तृतीय सर्ग का सारांश लिखिए।

अथवा ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में वर्णित राजनीतिक संघर्ष का अपने शब्दों में विवेचन कीजिए।

अथवा ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य में वर्णित किसी प्रेरणास्पद घटना का उल्लेख कीजिए।

अथवा ‘ ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य भारत के राजनीतिक संघर्ष का एक दस्तावेज है । ” सिद्ध कीजिए।

अथवा ‘त्यागपथी’ के आधार पर तत्कालीन राजनीतिक घटनाचक्र पर प्रकाश डालिए।

उत्तर – कवि रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ द्वारा रचित ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य एक ऐतिहासिक काव्य है, जिसमें छठी शताब्दी के प्रसिद्ध सम्राट् हर्षवर्धन के त्याग, तप और सात्त्विकता का वर्णन किया गया है। सम्राट् हर्ष की वीरता का वर्णन करते हुए कवि ने इसमें राजनैतिक एकता और विदेशी आक्रान्ताओं के भारत से भागने का भी वर्णन किया है। सम्पूर्ण कथानक पाँच सर्गों में विभक्त है, जो इस प्रकार हैं—

                  प्रथम सर्ग (सरांश)

हर्षवर्धन शिकार खेलने में व्यस्त थे, तभी उन्हें अपने पिता के रोगग्रस्त होने का समाचार मिला। समाचार पा हाँ वे लौट आए। पिता को स्वस्थ करने के लिए उन्होंने बहुत उपचार कराए, परन्तु सब उपाय असफल ही रहे। उधर उनके बड़े भाई राज्यवर्धन उत्तरापथ पर हूणों के आक्रमण को विफल करने में लगे थे। हर्ष ने दूत भेजकर पिता की अस्वस्थता का समाचार उन तक पहुँचाया। इधर हर्ष की माता ने पति की अस्वस्थता को बढ़ता हुआ देखकर आत्मदाह करने का निश्चय किया। हर्ष के बहुत समझाने पर भी उन्होंने अपना निर्णय नहीं बदला और पति की मृत्यु से पूर्व ही भस्मीभूत हो गईं। कुछ समय बाद हर्ष के पिता की भी मृत्यु हो गई। पिता का अन्तिम संस्कार करके हर्ष दुःखी मन से राजमहल में लौट आए।

              द्वितीय सर्ग (सरांश)

पिता की अस्वस्थता का समाचार सुनकर राज्यवर्धन भी वापस लौट आए, किन्तु माता-पिता की मृत्यु के दुःखद समाचार को सुनकर उन्होंने वैराग्य धारण करने का निश्चय किया। हर्ष ने उन्हें बहुत समझाया कि वह (हर्ष) अकेले रह जाएँगे। दोनों भाइयों में यह वार्त्तालाप चल ही रहा था कि मालवराज द्वारा राज्यश्री (उनकी छोटी बहन) को बन्दी बनाने और उसके पति गृहवर्मन को मार डालने का समाचार मिला। राज्यवर्धन ने वैराग्य भाव भूलकर कन्नौज की ओर प्रस्थान किया।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने गौंड- नरेश को पराजित किया, परन्तु लौटते समय मार्ग में धोखे से उनकी हत्या कर दी गई। हर्षवर्धन को जब यह सूचना मिली कि राज्यवर्धन का वध कर दिया गया है तो वे विशाल सेना लेकर उससे लड़ने के लिए चल पड़े, परन्तु तभी सेनापति भण्डि से उन्हें अपनी बहन के वन में जाने का समाचार मिला।

यह समाचार पाकर हर्ष अपनी बहन को खोजने के लिए वन की ओर चल पड़े। वहाँ एक भिक्षु द्वारा उन्हें राज्यश्री के अग्नि प्रवेश के लिए उद्यत होने का समाचार मिला। शीघ्र ही वहाँ पहुँचकर हर्ष ने राज्यश्री को बचा लिया और कन्नौज लौटकर उन्होंने अपनी बहन के नाम पर ही शासन चलाया।

                तृतीय सर्ग (सरांश)

इस सर्ग में सम्राट् हर्ष की इतिहास प्रसिद्ध दिग्विजय का वर्णन किया गया है। छह वर्षों तक निरन्तर युद्ध करते हुए हर्ष ने नर्मदा तट तक समस्त उत्तराखण्ड को जीत लिया। मिथिला, बिहार, गौंड, उत्कल आदि पूर्वांचल के सभी देश उसके अधीन हो गए। हर्ष यवन, हूण और अन्य विदेशी शत्रुओं का विनाश करके तथा देश को अखण्ड और शक्तिशाली बनाकर शान्ति स्थापित करना चाहता था। उन्होंने अपनी बहन के प्रेम के कारण थानेश्वर के स्थान पर कन्नौज को अपने विशाल साम्राज्य की राजधानी बनाया। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी तथा धर्म, संस्कृति और कला की भी पर्याप्त उन्नति हो रही थी।

              चतुर्थ सर्ग (सरांश)

इस सर्ग में राज्यश्री, हर्ष और आचार्य दिवाकर के वार्त्तालाप का वर्णन किया गया है। यद्यपि राज्यश्री भी अपने भाई के साथ ही कन्नौज के राज्य की संयुक्त रूप से शासिका थी, परन्तु मन से तथागत (भगवान् बुद्ध) की उपासिका थी। अतः काषाय वस्त्र धारणकर वह भिक्षुणी बनना चाहती है, परन्तु हर्ष इसके लिए तैयार नहीं थे। बाद में आचार्य दिवाकर ने संन्यास धर्म का तात्त्विक विवेचन करते हुए राज्य श्री. को मानव-कल्याण में लगने का उपदेश दिया। उनके उपदेशों का पालन करते हुए राज्य श्री मानव-सेवा में लग गई।

            पंचम सर्ग (सरांश)

इस सर्ग में हर्ष के त्यागी और व्रती जीवन का वर्णन किया गया है। हर्ष ने प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर त्याग- व्रत का महोत्सव मनाने का निश्चय किया। उन्होंने देश के सभी ब्राह्मणों, श्रमणों, भिक्षुओं, धार्मिक व्यक्तियों आदि को वहाँ आने के लिए निमन्त्रण दिया और अपने सम्पूर्ण संचित कोष को दान देने की घोषणा की—

हुई थी घोषणा सम्राट् की साम्राज्य भर में,

        करेंगे त्याग सारा कोष ले संकल्प कर में।

माघ के महीने में प्रयाग में त्रिवेणी तट पर प्रतिवर्ष विशाल मेला लगता था। इस अवसर पर प्रति पाँचवें वर्ष हर्ष सर्वस्व दान कर देते थे और अपनी बहन राज्यश्री से माँगकर वस्त्र धारण करते थे। इस प्रकार वे एक साधारण व्यक्ति के रूप में ही अपनी राजधानी वापस लौटते थे।

इस प्रकार ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य का कथानक अत्यन्त मार्मिक एवं प्रभावशाली है। सम्राट हर्षवर्धन के माध्यम से कवि ने तंत्कालीन श्रेष्ठ शासन का उल्लेख करते हुए भारतीय धर्म, संस्कृति और समाज की उन्नति का सशक्त रूप में वर्णन किया है। खण्डकाव्य के अन्तिम सर्ग में कवि ने यही सन्देश दिया है

भूले सभी कर्त्तव्य वही बड़ा, जो निज देश की रक्षा सिखाए ।

धर्म बड़ा सबसे वही, एकता का जो सदा विश्वास जगाए ।

नीति वही सबसे बड़ी, जो सबमें सद्भावना, प्रेम बढ़ाए।

त्याग बड़ा वही है जिसमें अपने को स्वयं नर भूलता जाए ।

प्र. 1. ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के नायक ( प्रमुख पात्र ) हर्षवर्द्धन का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर.हर्षवर्द्धन ‘त्यागपथी’ के नायक हैं। इस खण्डकाव्य के सम्पूर्ण कथा का केन्द्र वही हैं। सम्पूर्ण घटनाचक्र उन्हीं के चारों ओर घूमता है। कथा आरम्भ से अन्त तक हर्षवर्द्धन से ही सम्बद्ध रहती है। हर्षवर्द्धन के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. आदर्श पुत्र एवं भाई – इस खण्डकाव्य में हर्षवर्द्धन एक आदर्श पुत्र एवं आदर्श भाई के रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। अपने पिता के रुग्ण होने का समाचार पाकर वे आखेट से तुरन्त लौट आते हैं और यथासामर्थ्य उनकी चिकित्सा करवाते हैं। पिता के स्वस्थ न होने तथा माता द्वारा आत्मदाह करने की बात सुनकर वे भाव विह्वल हो जाते हैं। वे अपनी माता से कहते हैं—

मुझे मन्द पुण्य को छोड़ न माँ भी जाओ ।

     छोड़ो विचार यह, मुझे चरणों में लिपटाओ ॥

  1. देश – प्रेमी – हर्षवर्द्धन सच्चे देश प्रेमी हैं। उन्होंने छोटे राज्यों को एक साथ मिलाकर विशाल राज्य की स्थापना की। देश की एकता एवं रक्षा हेतु वे बड़े-से-बड़ा युद्ध करने से भी नहीं हिचकते थे। उन्होंने एक बड़े राज्य की स्थापना ही नहीं की वरन् धर्मपूर्वक शासन भी किय। देश – सेवा ही उनके जीवन का व्रत है।
  2. अजेय योद्धा – हर्षवर्द्धन एक अजेय योद्धा हैं। विद्रोही उनके तेजबल के आगे ठहर नहीं पाता। कोई भी राजा उन्हें पराजित नहीं कर सका। भारत के इतिहास में महाराज हर्षवर्द्धन की दिग्विजय, उनका युद्ध-कौशल और उनकी अनुपम वीरता स्वर्णाक्षरों में लिखी है।
  3. श्रेष्ठ शासक – महाराज हर्षवर्द्धन एक श्रेष्ठ शासक हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन प्रजा के हितार्थ ही समर्पित है। उनका शासन धर्म-शासन है। उनके शासन में सभी जनों को समान न्याय एवं सुख उपलब्ध है।
  4. महान त्यागी — हर्षवर्द्धन महान त्यागी एवं आत्मसंयमी हैं। आत्मसंयम • एवं सर्वस्व त्याग करने के कारण ही कवि ने उन्हें ‘त्यागपथी’ के नाम से पुकारा है। प्रयाग में छह बार अपना सर्वस्व प्रजा के लिए दे देना उनके महान त्याग का प्रमाण है। सर्वस्व दान के बाद वे अपने पहनने के वस्त्र भी अपनी बहन राज्यश्री से माँगकर पहनते हैं

दिये सम्राट ने निज वस्त्र आभूषण वहाँ पर

       बहिन से भीख में माँग बसन पहिना वहाँ पर ॥

  1. धर्मपरायण — हर्षवर्द्धन के जीवन में धर्मपरायणता कूट-कूटकर भरी हुई है। उन्होंने शैव, शाक्त, वैष्णव और वेद मत को एक साथ रखा। उन्होंने – किसी के प्रति भी भेदभाव नहीं बरता ।
  2. कर्त्तव्यनिष्ठ एवं दृढनिश्चयी – सम्राट हर्ष ने आजीवन अपने कर्त्तव्य का पालन किया। प्रारम्भ में इच्छा न होते हुए भी अपने भाई के कहने पर राज्य सँभाला और प्रत्येक संकटापन्न स्थिति में अपने कर्त्तव्य को निभाया। बहन राज्य श्री को वनो में खोजकर वे अपनी कर्त्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हैं तथा भाई की छल से की गयी हत्या का समाचार सुनकर उन्होंने जो

प्रतिज्ञा की थी, उससे उनके दृढनिश्चय का पता चलता है

लेकर चरण रज आर्य की करता प्रतिज्ञा आज मैं,

    निर्मल कर दूंगा धरा से अधर्म गौड़ समाज मैं |

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि हर्ष का चरित्र एक महान राजा, आदर्श भाई, आदर्श पुत्र और महान त्यागी का चरित्र है, जिसके लिए प्रजा की सुख-सुविधा ही सर्वोपरि है और वह अपने मानवीय कर्त्तव्यों के प्रति भी निष्ठावान है।

प्र.5. ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के आधार पर राज्यश्री का चरित्र-चित्रण (चरित्रांकन) कीजिए।

या ‘त्यागपथी’ खण्डकाव्य के प्रमुख नारी पात्र का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर. राज्य श्री सम्राट हर्षवर्द्धन की छोटी बहन है। हर्षवर्द्धन के चरित्र के बाद राज्यश्री का चरित्र ही ऐसा है, जो पाठकों के हृदय एवं मस्तिष्क पर छा जाता है। साज्यश्री के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत् हैं

  1. माता-पिता की लाडली – राज्यश्री अपने माता-पिता को प्राणों से भी प्यारी है। कवि कहता है- है—

 माँ की ममता की मूर्ति राज्यश्री सुकुमारी।

     थी सदा पिता को माँ को प्राणोपम प्यारी ॥

  1. आदर्श नारी – राज्यश्री आदर्श पुत्री, आदर्श बहन और आदर्श पत्नी के रूप में हमारे समक्ष आती है। वह यौवनावस्था में विधवा हो जाती है तथा गौड़पति द्वारा बन्दिनी बना ली जाती है। भाई राज्यवर्द्धन की मृत्यु के बाद वह कारागार से भाग जाती है और वन में भटकती हुई एक दिन आत्मदाह के लिए उद्यत हो जाती है; किन्तु अपने भाई हर्षवर्द्धन द्वारा बचा लेने पर वह तन-मन-धन से प्रजा की सेवा में ही अपना जीवन अर्पित कर देती है। हर्ष द्वारा राज्य सौंपे जाने पर भी वह राज्य स्वीकार नहीं करती। यही उसका आदर्श रूप, जो सबको आकर्षित करता है—

विपुल साम्राज्य की अग्रज सहित वह शासिका थी,

 अभ्यन्तर से तथागत की अनन्य उपासिका थी ।

  1. देश-भक्त एवं जन-सेविका – राज्यश्री के मन में देशप्रेम और लोकं कल्याण की भावना कूट-कूटकर भरी हुई है। हर्ष के समझाने पर वह अपने वैधव्य का दुःख झेलती हुई भी देश सेवा में लगी रहती है। देशप्रेम के कारण राज्यश्री संन्यासिनी बनने का विचार भी छोड़ देती तथा शेष जीवन को देश सेवा में ही लगाने का व्रत लेती है

करूँगी साथ उनके मैं हमेशा राष्ट्र-साधन |

     अहिंसा नीति का होगा सभी विधिपूर्ण पालन ॥

प्रजा के हित समर्पित है व्रती जीवन तुम्हारा ।

          ×            ×             ×

    सभी का हित सभी का सुख, तुम्हें दिन-रात प्यारा ।

  1. करुणामयी नारी – राज्यश्री ने माता-पिता की मृत्यु तथा पति और बड़े भाई की मृत्यु के अनेक दुःख झेले। इन दुःखों ने उसे करुणा की मूर्ति बना दिया। अपने अग्रज हर्षवर्द्धन से मिलते समय उसकी कारुणिक दशा अत्यन्त मार्मिक प्रतीत होती है—

सतत बिलखती थी बहिन माता-पिता की याद कर ।

ले नाम सखियों का, उमड़ती थी नदी-सी वारि भर ॥

था सास्त्र अग्रज धैर्य देता माथ उसका ढाँपकर ।

रोती रही अविरल बहिन बेतस लता-सी काँपकर ॥

  1. त्यागमयी नारी — राज्यश्री का जीवन त्याग की भावना से आलोकित है। भाई हर्षवर्द्धन द्वारा कन्नौज का राज्य दिये जाने पर भी वह उसे स्वीकार नहीं करती। वह कहती है

स्वीकार न मुझको कान्यकुब्ज बैठो उस सिंहासन ।

पर तुम करो शौर्य से शासन ॥

वह राज्य कार्य के बन्धन में पड़ना नहीं चाहती; क्योंकि वह मन से संन्यासिनी है। हर्षवर्द्धन के समझाने पर भी वह नाममात्र की ही शासिका बनी रहती है। प्रयाग महोत्सव के समय हर्षवर्द्धन के साथ राज्यश्री भी अपना सर्वस्व प्रजा के हितार्थ त्याग देती है

लुटाती थी बहन भी पास का सब तीर्थस्थल में,

पहिन दो वस्त्र केवल दीपती थी छवि विमल में ॥

  1. सुशिक्षिता एवं ज्ञान – सम्पन्न – राज्य श्री सुशिक्षिता एवं शास्त्रों के ज्ञान – से सम्पन्न है। जब आचार्य दिवाकर मित्र संन्यास धर्म का तात्विक विवेचन करते हुए उसे मानव-कल्याण के कार्य में लगने का उपदेश देते हैं तब राज्यश्री इसे स्वीकार कर लेती है और आचार्य की आज्ञा का पूर्णरूपेण पालन करती है। इस प्रकार राज्यश्री का चरित्र एक आदर्श भारतीय नारी का चरित्र है। उसके पतिव्रत-धर्म, देश – धर्म, करुणा और कर्त्तव्यनिष्ठा के आदर्श निश्चिय ही अनुकरणीय हैं।
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