UP Board Class 12 Question Bank 2026 : Gyansindhu Pariksha Prahar General Hindi सामान्य हिंदी की क्वेश्चन बैंक 2026 (Full Book – PAGE-28)
निंदा रस – हरिशंकर परसाई-1
(1) ‘क’ कई महीने बाद आए थे। सुबह चाय पीकर अखबार देख रहा था कि वे तूफ़ान की तरह कमरे में घुसे। ‘साइक्लोन’ की तरह मुझे अपनी भुजाओं में जकड़ा तो मुझे धृतराष्ट्र की भुजाओं में जकड़े भीम के पुतले की याद आ गयी। यह धृतराष्ट्र की ही जकड़ थी। अंधे धृतराष्ट्र ने टटोलते हुए पूछा, ‘‘कहाँ है भीम? आ बेटा, तुझे कलेजे से लगा लूं।’’ और जब भीम का पुतला उनकी पकड़ में आ गया तो उन्होंने प्राणघाती स्नेह से उसे जकड़कर चूर कर डाला।
- उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार ‘हरिशंकर परसाई’ द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक पाठ शीर्षक से उद्धृत है।
- रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- ‘क’ कमरे में तूफान की तरह घुसे और साइक्लोन की तरह मुझे अपनी भुजाओं में जकड़ लिया। मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा तो मुझे धृतराष्ट्र की भुजाओं में जकड़े भीम के पुतले की याद आ गयी। धृतराष्ट्र अन्धे थे। उन्होंने भीम के पुतले को जिन्दा समझ कर मारने का प्रयास किया था।
- ‘क’ किस तरह कमरे में घुसे और उन्होंने किस तरह मुझे भुजाओं में जकड़ा?
उत्तर- ‘क’ कमरे में तूफान की तरह घुसे और साइक्लोन की तरह मुझे भुजाओं में जकड़ा।
- लेखक को किसके पुतले की याद आ गयी?
उत्तर- लेखक को धृतराष्ट्र की भुजाओं में जकड़े भीम के पुतले की याद आ गयी।
- धृतराष्ट्र ने भीम के पुतले के साथ क्या किया?
उत्तर- जब भीम का पुतला धृतराष्ट्र की पकड़ में आ गया तो उन्होंने प्राणघाती प्रेम से उसे जकड़ कर चूर कर डाला।
(2) निंदा का उद्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निंदा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। उसके अहम् की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निंदा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। कठिन कर्म ही ईर्ष्या-द्वेष और इनसे उत्पन्न निंदा को मारता है। इंद्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है क्योंकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, बे बनाया महल और बिन-बोये फल मिलते हैं। अकर्मण्यता में उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय रहता है, इसलिए कर्मी मनुष्यों से उन्हें ईर्ष्या होती हैं। इन्द्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है क्योंकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, वे बनाया महल और बिन बोये फल मिलते हैं। अकर्मण्यता में उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है, इसलिए कर्मी मनुष्यों से उन्हें ईर्ष्या होती है।
- उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर- प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार ‘हरिशंकर परसाई’ द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक पाठ शीर्षक से उद्धृत है।
- रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।
रेखांकित अंश-1– निंदा का उद्गम ही ……….. बढ़ती जाती है।
उत्तर- परसाई जी कहते हैं कि मनुष्य के हीनभावना और उसकी कर्महीनता से निंदा का जन्म होता है। जब व्यक्ति में हीनता की भावना प्रवेश कर जाती है, तब वह आलसी हो जाता है और उसकी कर्म शक्ति क्षीण हो जाती है। तब वह निंदा का आश्रय लेकर स्वयं को ऊँचा दिखाने का प्रयास करता है और अपनी हीनता छिपाने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार व्यक्ति आत्महीनता के बोझ से दबा रहता है। हीनभावना से ग्रस्त व्यक्ति दूसरों की निंदा करके तथा उन्हें तुच्छ और निकृष्ट बताकर अपने अहं की तुष्टि करते हैं। वे समझते हैं कि इस प्रकार वे समाज में अपने महत्त्व की स्थापना कर रहे हैं। जिस प्रकार एक लम्बी लकीर को छोटी करने के लिए उसके कुछ भाग को मिटाकर छोटी लकीर को बड़ा किया जाता है उसी प्रकार जैसे-जैसे मनुष्य के कर्म क्षीण होते जाते हैं वैसे- वैसे निन्दा बढ़ने लगती है।
- रेखांकित अंश-2- इंद्र बड़ा ईर्ष्यालु ………….. ईर्ष्या होती हैं ।
उत्तर- परसाई जी कहते हैं कि इन्द्र को बड़ा ईर्ष्यालु देवता माना जाता है; क्योंकि उसे कुछ नहीं करना पड़ता, वह निठल्ला रहता है। उसे खाने के लिए अन्न नहीं उगाना पड़ता, फल पाने के लिए पेड़ नहीं बोने पड़ते, रहने के लिए बना-बनाया महल मिल जाता है। खाली रहने के कारण उसे अपनी अप्रतिष्ठा का डर बना रहता है। इसलिए वह किसी तपस्वी को तपस्या करते देखकर, किसी कर्मठ व्यक्ति को श्रेष्ठ कर्म करते देखकर ही भयभीत हो जाता है कि कहीं यह अपनी कर्मठता से मेरे पद को न छीन ले; अतः वह उससे ईर्ष्या करने लगते हैं।
- निन्दा की प्रवृत्ति कब बढ़ती है?
उत्तर- लेखक का कहना है कि जैसे-जैसे व्यक्ति कर्महीन होता जाता है। वैसे-वैसे उसमें निंदा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।
- देवताओं को भय क्यों बना रहता है?
उत्तर- देवताओं को कर्महीनता की स्थिति में अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है।
- निन्दा रस का उद्गम कब होता है?
उत्तर- निंदा रस का उद्गम हीनता और कमजोरी से होता है।
- कर्मक्षीण होने पर किसकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है?
उत्तर- कर्मक्षीण होने पर निंदा की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।
- निन्दा का उद्गम स्थल क्या है?
उत्तर- निंदा का उद्गम स्थल कर्महीनता है।
- निन्दक व्यक्ति दूसरों की निन्दा करके कैसा अनुभव करता है?
उत्तर- निन्दक व्यक्ति दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है।
- इन्द्र को ईर्ष्यालु क्यों माना जाता है?
उत्तर- निठल्ला होने के कारण इन्द्र को ईर्ष्यालु माना जाता है।
- ‘हीनता’ और ‘कर्मक्षीण’ का शब्दार्थ क्या है?
उत्तर- ‘हीनता’ का अर्थ ‘तुच्छता’ और ‘कर्मक्षीण’ का अर्थ कर्महीनता’ है।
- निन्दा का उद्गम कहाँ से होता है?
उत्तर- निंदा का उद्गम हीनता और कमजोरी से होता है।
- देवताओं को कर्मी मनुष्यों से क्यों ईर्ष्या होती है?
उत्तर- लेखक के अनुसार देवताओं को कर्मी मनुष्यों से ईर्ष्या इसलिए होती है, क्योंकि वे अकर्मण्य होते हैं।
- ईर्ष्या-द्वेष और निन्दा को मारने के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर- कठिन कर्म ईर्ष्या-द्वेष और निन्दा को मारने के लिए आवश्यक है।
- स्वर्ग में देवताओं को बिना श्रम का क्या प्राप्त होता है?
उत्तर- स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, बे बनाया महल और बिना बोये फल मिलते हैं।
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